May 15, 2026 10:14 pm

पांढुर्णा वॉच महा-पड़ताल: क्या ‘गीता क्लीनिक’ पर हुई कार्रवाई महज एक सुनियोजित ‘खानापूर्ति’ थी? कुबूलनामे और ‘सिरींज’ मिलने के बाद भी सील क्यों नहीं हुआ क्लीनिक? जब तक ताला नहीं लगेगा, मुहीम रुकेगी नहीं!

जब 15 दिन की पत्रकारिता के दबाव में जागा ‘सिस्टम’, पर क्या कार्रवाई की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी?

लोकतंत्र में जब व्यवस्थाएं मौन ओढ़ लेती हैं, तब एक निडर पत्रकारिता ही प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाती है। पांढुर्णा के ग्राम सिवनी में संचालित ‘गीता क्लीनिक’ और उसके संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास के अवैधानिक तिलिस्म को लेकर ‘पांढुर्णा वॉच’ ने जो 15 दिन की लगातार मुहिम छेड़ी थी, उसका बड़ा असर देखने को मिला है। मीडिया के भारी दबाव के बाद, अंततः पांढुर्णा के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. दीपेंद्र सलामे ने मौके पर जाकर जांच की और पंचनामा बनाया।

​हम ‘पांढुर्णा वॉच’ की ओर से बीएमओ साहब के इस कदम की खुले दिल से प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने अपने वातानुकूलित कक्ष से निकलकर मैदानी स्तर पर यह कार्रवाई की। इस जांच के दौरान कैमरे के सामने डॉ. बिस्वास ने स्वयं कुबूल किया कि उनके पास एलोपैथी का कोई लाइसेंस नहीं है। लेकिन, इस ‘सराहनीय’ कार्रवाई के भीतर कई ऐसे विरोधाभास, गायब सुबूत और अनसुलझे रहस्य छिपे हैं, जो पूरी जांच को संदेह के गहरे घेरे में ला खड़ा करते हैं।

​आम जनता और उच्च अधिकारियों को यह सोचना होगा कि क्या यह वास्तव में एक निष्पक्ष कार्रवाई थी, या फिर मीडिया का मुंह बंद करने के लिए रचा गया एक ‘सुनियोजित नाटक’? आइए, अत्यंत सौम्य भाषा और 6 विस्तृत तार्किक बिंदुओं के माध्यम से इस कार्रवाई के ‘पर्दे के पीछे’ का सच डिकोड करते हैं:

1. 15 दिन की खबरें, ‘रात्रिकालीन दौरा’, और अचानक बोर्ड पर पुता ‘पेंट’: क्या यह कार्रवाई पूर्व-नियोजित थी?

हम बीएमओ साहब की कार्रवाई का सम्मान करते हैं, लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि 15 दिन से खबरें चलने के बावजूद कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? जन-चर्चाओं के अनुसार, कार्रवाई से  पहले बीएमओ साहब ने सिवनी का ‘रात्रिकालीन दौरा’ किया था। और क्या यह  ‘अद्भुत संयोग’ है कि उस दौरे के तुरंत बाद, रातों-रात क्लीनिक के बाहर लगे बोर्ड (जिस पर अमान्य डिग्रियां लिखी थीं) पर ‘पेंट’ पोत दिया गया? क्या प्रशासन की यह कार्रवाई एक ‘सरप्राइज रेड’ थी, या फिर सबूत मिटाने का पूरा ‘अवसर’ देने के बाद की गई एक पूर्व-नियोजित (Scripted) खानापूर्ति? ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 238 के तहत साक्ष्य मिटाना एक गंभीर अपराध है।

2. ऑन-कैमरा कुबूलनामा- “लाइसेंस नहीं है, 35 साल से प्रैक्टिस कर रहा हूँ”: क्या प्रशासन के लिए इतना पर्याप्त नहीं?

कार्रवाई के दौरान मीडिया के सामने सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब डॉ. बिस्वास ने स्वयं यह स्पष्ट रूप से कुबूल किया कि उनके पास एलोपैथी प्रैक्टिस का कोई लाइसेंस नहीं है और वे मात्र एक आधार कार्ड के भरोसे 35 साल से इलाज कर रहे हैं! ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 साफ कहती है कि बिना वैध पंजीकरण के चिकित्सा करना 1 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने वाला अपराध है । जब अपराधी ने स्वयं कैमरे और सरकारी पंचनामे में अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है, तो फिर क्लीनिक को तुरंत सील करने और FIR दर्ज कराने में बीएमओ कार्यालय के हाथ किसने बांध रखे हैं?

3. दवाइयां ‘गायब’, पर सिरींज और पर्ची मौजूद: तो क्या डॉक्टर साहब 35 साल से ‘हवा’ की प्रैक्टिस कर रहे थे?

बीएमओ की जांच का सबसे हास्यास्पद और संदेहास्पद पहलू यह रहा कि क्लीनिक में इंजेक्शन लगाने वाली सिरींज (Syringes), मेडिकल उपकरण और दवाइयां लिखने वाली पर्चियां (Prescription Pads) तो मिलीं, लेकिन एलोपैथिक ‘दवाइयां’ नहीं मिलीं! कोई भी आम इंसान यह समझ सकता है कि जिस व्यक्ति ने रातों-रात अपने बोर्ड पर पेंट पोत दिया हो, क्या उसने जांच से पहले अपनी दवाइयां कहीं और नहीं छुपा दी होंगी? यदि वहां दवाइयां नहीं थीं, तो सिरींज और पर्चे क्या सिर्फ ‘सजावट’ के लिए रखे गए थे? यह स्पष्ट दर्शाता है कि जांच से पहले ही डॉक्टर को ‘सतर्क’ कर दिया गया था।

4. कुसुम उकार की व्यथा: अगर दवा नहीं थी, तो वो लकवे वाला ‘जहरीला’ इंजेक्शन किसका था?

दवाइयां न मिलने की थ्योरी उस वक्त तार-तार हो जाती है, जब हम सिवनी की गरीब और विधवा महिला कुसुम उकार की दर्दनाक कहानी देखते हैं। कुसुम जी का स्पष्ट आरोप है कि डॉ. बिस्वास द्वारा लगाए गए एक इंजेक्शन के कारण ही उनकी कमर में भयंकर गठान बनी, जिसे ठीक कराने में उनके 80 हजार रुपये बर्बाद हो गए। यदि डॉक्टर साहब के पास दवाइयां थीं ही नहीं, तो कुसुम जी के शरीर में कौन सा रासायनिक पदार्थ इंजेक्ट किया गया था? क्या बीएमओ साहब की जांच में एक विधवा महिला की इस जानलेवा पीड़ा का कोई संज्ञान लिया गया? भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गलत इलाज से स्थायी नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ का अपराध है।

5. कोलकाता की डिग्रियों की ‘तथाकथित’ जांच और ‘पंचनामे’ की प्रति छिपाने का रहस्य

बताया जा रहा है कि डॉक्टर की ‘कोलकाता’ वाली डिग्रियों को जांच के दायरे में रखा गया है। ‘पांढुर्णा वॉच’ प्रशासन की सुविधा के लिए बता दे कि वह डिग्री ‘इंडियन बोर्ड ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन्स’ (IBAM) की है, जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने वर्षों पहले ‘फर्जी’ (Fake) घोषित कर रखा है। वहीं, जब एक पारदर्शी व्यवस्था के तहत बीएमओ कार्यालय से इस जब्ती के ‘पंचनामे’ की कॉपी मांगी गई, तो अभी तक कोई जानकारी नहीं दी गई है। क्या पंचनामे में कोई ऐसा ‘झोल’ है जिसे मीडिया और जनता से छिपाया जा रहा है?

6. क्या टूट जाएगा व्यवस्था से जनता का भरोसा? ‘पांढुर्णा वॉच’ का अटल संकल्प- जब तक सील नहीं, मुहीम रुकेगी नहीं!

यदि 35 साल से बिना लाइसेंस चल रहे क्लीनिक, ऑन-कैमरा कुबूलनामे, सिरींज और पर्चियों की जब्ती, और एक विधवा महिला के 80 हजार के नुकसान के बाद भी ‘गीता क्लीनिक’ सील नहीं होता है; यदि केवल ‘पंचनामा’ बनाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जाती है, तो उच्च अधिकारियों   इस कार्यप्रणाली पर गहरा संज्ञान लेना होगा। ‘पांढुर्णा वॉच’ स्पष्ट करना चाहता है कि हम इस आधी-अधूरी कार्रवाई से रुकने वाले नहीं हैं। जब तक कानून के शासन के तहत गीता क्लीनिक पर वैधानिक ताला नहीं लग जाता, हमारी यह जनहितकारी मुहीम निरंतर जारी रहेगी!

जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory/Legal Disclaimer):

यह समाचार पूर्णतः ‘पांढुर्णा वॉच’ की जमीनी पड़ताल, हाल ही में स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई आधिकारिक जांच, ऑन-कैमरा कुबूलनामे, प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों, और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (NMC Act, BNS) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति या अधिकारी पर निराधार आरोप लगाना नहीं है, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के मूल अधिकार की रक्षा हेतु कार्रवाई में पारदर्शिता की मांग करना और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। खबर में उठाए गए सभी विषय प्रश्नवाचक (?) शैली में जनहित के सवाल मात्र हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच उच्च अधिकारियों द्वारा अपेक्षित है।

और पढ़ें

पांढुर्णा वॉच महा-पड़ताल: क्या ‘गीता क्लीनिक’ पर हुई कार्रवाई महज एक सुनियोजित ‘खानापूर्ति’ थी? कुबूलनामे और ‘सिरींज’ मिलने के बाद भी सील क्यों नहीं हुआ क्लीनिक? जब तक ताला नहीं लगेगा, मुहीम रुकेगी नहीं!

और पढ़ें

पांढुर्णा वॉच महा-पड़ताल: क्या ‘गीता क्लीनिक’ पर हुई कार्रवाई महज एक सुनियोजित ‘खानापूर्ति’ थी? कुबूलनामे और ‘सिरींज’ मिलने के बाद भी सील क्यों नहीं हुआ क्लीनिक? जब तक ताला नहीं लगेगा, मुहीम रुकेगी नहीं!