
15 दिन की पत्रकारिता के दबाव में जागा प्रशासन, पर क्या कार्रवाई की ‘स्क्रिप्ट’ पहले ही तय थी?
एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज के निर्माण में प्रशासन की भूमिका एक निष्पक्ष अभिभावक जैसी होती है। पांढुर्णा के ग्राम सिवनी में संचालित ‘गीता क्लीनिक’ और डॉ. आर. एन. बिस्वास के अवैधानिक तिलिस्म को लेकर ‘पांढुर्णा वॉच’ ने पिछले 15 दिनों से जो पुख्ता साक्ष्यों पर आधारित मुहिम छेड़ी थी, उसका एक बड़ा असर देखने को मिला। मीडिया के भारी दबाव के बाद, अंततः पांढुर्णा के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. दीपेंद्र सलामे ने मौके पर जाकर जांच की और पंचनामा बनाया।
हम ‘पांढुर्णा वॉच’ की ओर से बीएमओ साहब के इस कदम की खुले दिल से प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने मैदानी स्तर पर उतरकर यह कार्रवाई की। इस जांच के दौरान कैमरे के सामने डॉ. बिस्वास ने स्वयं कुबूल किया कि उनके पास एलोपैथी का कोई वैध लाइसेंस नहीं है और वे 35 साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं।
लेकिन, इस ‘सराहनीय’ कार्रवाई के भीतर कई ऐसे हास्यास्पद विरोधाभास, गायब सुबूत और अनसुलझे रहस्य छिपे हैं, जो इस पूरी जांच प्रक्रिया को संदेह के गहरे घेरे में ला खड़ा करते हैं। इसके साथ ही, एक ऐसा ‘वायरल वीडियो’ सामने आया है, जिसे प्रशासन को डराने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया, लेकिन वह खुद ही इस अवैध क्लीनिक के गले की फांस बन गया। आइए, अत्यंत सौम्य भाषा और 6 विस्तृत तार्किक बिंदुओं के माध्यम से इस ‘कार्रवाई’ के पर्दे के पीछे का सच डिकोड करते हैं:
15 दिन का ‘मौन’, ‘रात्रिकालीन दौरा’, और अचानक पुता ‘पेंट’: क्या यह ‘सरप्राइज रेड’ थी या पूर्व-नियोजित जांच?
हम बीएमओ साहब की कार्रवाई का सम्मान करते हैं, लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि 15 दिन से डिजिटल साक्ष्य सामने होने के बावजूद कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? जन-चर्चाओं के अनुसार, कार्रवाई से कुछ दिन पहले बीएमओ साहब ने सिवनी का ‘रात्रिकालीन दौरा’ किया था। क्या यह महज एक ‘अद्भुत संयोग’ है कि उस दौरे के तुरंत बाद, रातों-रात क्लीनिक के बाहर लगे बोर्ड (जिस पर अमान्य डिग्रियां लिखी थीं) पर ‘पेंट’ पोत दिया गया? क्या प्रशासन की यह कार्रवाई एक ‘सरप्राइज रेड’ थी, या फिर साक्ष्य मिटाने का पूरा ‘अवसर’ देने के बाद की गई एक पूर्व-नियोजित (Scripted) खानापूर्ति? ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 238 के तहत साक्ष्य मिटाना एक गंभीर अपराध है।
ऑन-कैमरा कुबूलनामा- “लाइसेंस नहीं है, 35 साल से प्रैक्टिस कर रहा हूँ”: क्या क्लीनिक सील करने के लिए यह पर्याप्त नहीं?
कार्रवाई के दौरान मीडिया के सामने सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब डॉ. बिस्वास ने स्वयं यह स्पष्ट रूप से कुबूल किया कि उनके पास एलोपैथी प्रैक्टिस का कोई लाइसेंस नहीं है और वे 35 साल से इलाज कर रहे हैं! ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 साफ कहती है कि बिना वैध पंजीकरण के चिकित्सा करना 1 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने वाला अपराध है । जब कथित डॉक्टर ने स्वयं कैमरे और सरकारी पंचनामे में अपना वैधानिक उल्लंघन स्वीकार कर लिया है, तो फिर ‘मध्य प्रदेश नर्सिंग होम एक्ट’ के तहत क्लीनिक को तुरंत सील करने और FIR दर्ज कराने में बीएमओ कार्यालय के हाथ किसने बांध रखे हैं?
‘पंचनामे’ की प्रति छिपाने का गहरा रहस्य: क्या पारदर्शी कार्रवाई में भी कोई ‘अदृश्य झोल’ है?
एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रशासनिक कार्रवाई की पहचान उसके दस्तावेजों की सार्वजनिक उपलब्धता से होती है। जब एक पारदर्शी व्यवस्था के तहत बीएमओ कार्यालय से इस निरीक्षण और जब्ती के ‘पंचनामे’ की कॉपी बार-बार मांगी गई, तो विभाग द्वारा कोई जानकारी नहीं दी गई। यह चुप्पी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। क्या पंचनामे में कोई ऐसा ‘झोल’ या ऐसी ‘कमजोर भाषा’ गढ़ी गई है जिसे मीडिया और उच्च अधिकारियों से छिपाया जा रहा है? यदि कार्रवाई पूर्णतः सत्यनिष्ठा से की गई है, तो दस्तावेज साझा करने में यह ‘असीम संकोच’ क्यों?
कानून-व्यवस्था (Law & Order) का डर और ग्रामीणों का ‘प्रायोजित’ वीडियो: एक सोची-समझी चाल?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी चालाकी तब देखने को मिली जब स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक वीडियो के अलावा, ग्रामीणों द्वारा एक अन्य वीडियो बड़ी तेजी से प्रचारित किया गया। इस वीडियो में ग्रामीण यह कहते हुए नजर आ रहे हैं कि “यदि डॉक्टर पर कार्रवाई हुई तो वे आंदोलन करेंगे” और साथ ही उन्होंने सिवनी के सरकारी अस्पताल में 24 घंटे डॉक्टर उपलब्ध कराने की मांग की। स्पष्ट है कि यह वीडियो प्रशासन को यह ‘डराने’ के लिए बनवाया गया था कि यदि इस क्लीनिक को सील करने जैसी कोई बड़ी वैधानिक कार्रवाई की गई, तो गांव में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।
‘बूमरैंग’ दांव: बचाव करने आए ग्रामीणों के ‘आत्मघाती’ वीडियो ने ही लगा दी ‘अवैध इलाज’ पर पक्की मुहर!
अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘बूमरैंग’ (Boomerang), यानी अपना ही वार खुद पर भारी पड़ जाना। इस वीडियो के जरिए जो ‘माइंड गेम’ खेला गया, वह खुद उन्हीं पर भारी पड़ गया। जिन ग्रामीणों को ढाल बनाकर प्रशासन को डराने की कोशिश की गई, उन्हीं ग्रामीणों ने वीडियो में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया कि “डॉक्टर साहब हमारा इलाज करते हैं।” जब डॉक्टर का खुद का कुबूलनामा और ग्रामीणों का यह सार्वजनिक बयान एक साथ मिलते हैं, तो यह इस बात का सबसे बड़ा ‘सार्वजनिक साक्ष्य’ बन जाता है कि वहां 100% मेडिकल प्रैक्टिस चल रही थी! अब स्वास्थ्य विभाग इस वीडियो को झुठलाकर यह नहीं कह सकता कि “वहां इलाज नहीं होता था।”
‘दवाइयां’ गायब, पर सिरींज और पर्ची (Prescription Pad) जब्त: क्या बिना दवाइयों के ही हो रहा था 35 साल से ‘जादुई’ इलाज?
बीएमओ की कार्रवाई का सबसे हास्यास्पद पहलू यह रहा कि क्लीनिक में इंजेक्शन लगाने वाली सिरींज (Syringes) और दवाइयां लिखने वाली पर्चियां तो मिलीं, लेकिन ‘दवाइयां’ नदारद थीं! यह ‘दवा न मिलने की थ्योरी’ उस वक्त तार-तार हो जाती है, जब हम सिवनी की गरीब और विधवा महिला कुसुम उकार की दर्दनाक कहानी देखते हैं। कुसुम जी का स्पष्ट आरोप है कि डॉ. बिस्वास द्वारा लगाए गए एक इंजेक्शन के कारण ही उनकी कमर में भयंकर गठान बनी, जिसे ठीक कराने में उनके 80 हजार रुपये बर्बाद हो गए। यदि डॉक्टर साहब के पास दवाइयां थीं ही नहीं, तो कुसुम जी के शरीर में कौन सा पदार्थ इंजेक्ट किया गया था? क्या जिस व्यक्ति ने रातों-रात अपना बोर्ड पेंट कर दिया हो, वह जांच से पहले अपनी दवाइयां नहीं छुपा सकता? क्या जांच दल ने इस बात का कोई संज्ञान लिया? भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 116 के तहत लापरवाही से स्थायी नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ का अपराध है।
निष्कर्ष: क्या टूट जाएगा व्यवस्था से जनता का भरोसा? ‘पांढुर्णा वॉच’ का अटल संकल्प- जब तक सील नहीं, मुहीम रुकेगी नहीं!
एक 10वीं पास (थर्ड डिवीजन) व्यक्ति को बचाने के लिए इतने सारे हथकंडे अपनाए जाना बेहद चिंताजनक है। ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 255 के तहत यदि कोई लोक सेवक (Public Servant) किसी व्यक्ति को कानूनी सजा से बचाने के इरादे से अपने कर्तव्यों की अवहेलना करता है, तो वह भी दंड का भागीदार है। ‘पांढुर्णा वॉच’ स्पष्ट करना चाहता है कि हम इस ‘दिखावटी’ और ‘आधी-अधूरी’ कार्रवाई से रुकने वाले नहीं हैं। जब तक कानून के शासन के तहत ‘गीता क्लीनिक’ पर वैधानिक ताला (सील) नहीं लग जाता, हमारी यह जनहितकारी मुहीम निरंतर जारी रहेगी!
जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory/Legal Disclaimer):
यह समाचार पूर्णतः ‘पांढुर्णा वॉच’ की जमीनी पड़ताल, स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में की गई आधिकारिक जांच, ऑन-कैमरा कुबूलनामे, प्राप्त डिजिटल व वीडियो साक्ष्यों, और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (NMC Act, MP Nursing Home Act, BNS) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था पर निराधार आरोप लगाना नहीं है, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के मूल अधिकार की रक्षा हेतु कार्रवाई में पारदर्शिता की मांग करना और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। खबर में उठाए गए सभी विषय ‘प्रश्नवाचक (?)’ शैली में जनहित के सवाल मात्र हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच उच्च अधिकारियों द्वारा अपेक्षित है।

