पिपला नारायणवार: शराब भट्टी का विरोध, अधूरे तथ्य और एक बड़ा सवाल— आखिर निशाना कौन और क्यों?

पांढुर्ना|  पिपला नारायणवार में इन दिनों एक शराब भट्टी का विरोध अंचल में चर्चा का विषय बना हुआ है। सम्मानीय विधायक श्री विजय चौरे जी इस भट्टी के विरोध में धरने पर बैठे हैं और पूरा निशाना क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति श्री उज्ज्वल सिंह चौहान (अज्जू ठाकुर) जी पर साधा जा रहा है। प्रथम दृष्टया यह एक जनहित का मुद्दा लगता है, लेकिन जब इस पूरे घटनाक्रम के वैधानिक और जमीनी तथ्यों की पड़ताल की जाती है, तो कुछ ऐसी बातें सामने आती हैं जो इस पूरे आंदोलन की दिशा और इसके असल मंतव्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा देती हैं:

1. कागजों की सच्चाई और निशाने पर गलत व्यक्ति

​इस पूरे विवाद का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि जिस व्यक्ति (श्री उज्ज्वल सिंह चौहान) का नाम लेकर यह पूरा विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है, वैधानिक रूप से उस शराब भट्टी का ठेका उनके नाम पर है ही नहीं। दस्तावेजों के अनुसार, ठेका किसी अन्य व्यक्ति (संभवतः रिश्तेदार) के नाम पर है और जिस व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से घेरा जा रहा है, उनका इस व्यापार से कोई सीधा कानूनी लेना-देना नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब कानूनी रूप से वह व्यक्ति उस भट्टी का मालिक ही नहीं है, तो फिर जानबूझकर उनका नाम क्यों घसीटा जा रहा है?

2. सदन की ताकत और प्रशासनिक विकल्प: फिर सड़क का रास्ता क्यों?

​एक निर्वाचित और सम्मानित विधायक के पास जनता की आवाज़ उठाने और किसी भी व्यवस्था को सुधारने के लिए विधानसभा, आबकारी विभाग और जिला प्रशासन जैसे बेहद मजबूत संवैधानिक विकल्प मौजूद होते हैं। वे एक पत्र या प्रशासनिक कार्यवाही से किसी भी समस्या का वैधानिक समाधान निकाल सकते हैं। ऐसे में इन प्रभावी कानूनी रास्तों को छोड़कर सड़क पर धरने का विकल्प चुनना और उसमें आम जनता का कीमती समय खपाना, यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह वास्तव में समस्या का हल निकालने का प्रयास है, या केवल लोगों की भीड़ जुटाकर किया जा रहा एक राजनीतिक इवेंट?

3. मानसून की दस्तक और अन्नदाता का कीमती समय

​वर्तमान समय इस कृषि प्रधान अंचल के लिए अत्यंत संवेदनशील है। मानसून ने दस्तक दे दी है और किसानों के लिए खेतों की जुताई, खाद-बीज की व्यवस्था और बुवाई की तैयारी का यह सबसे अहम वक्त है। ऐसे समय में जब किसान का एक-एक पल उसके परिवार का साल भर का भविष्य तय करता है, तब उसे किसी राजनीतिक धरने या शक्ति-प्रदर्शन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करना उसके आर्थिक हितों के साथ सीधा खिलवाड़ है। किसान की जगह इस वक्त किसी आंदोलन की भीड़ में नहीं, बल्कि उसके अपने खेत में होनी चाहिए।

4. भट्टी हटने से क्या नशा खत्म होगा? संपूर्ण शराबबंदी क्यों नहीं?

​व्यावहारिक और यथार्थवादी सत्य यह है कि यदि मान भी लिया जाए कि इस विरोध के बाद यह विशिष्ट भट्टी हटा दी जाती है, तो क्या इससे शराब पीने वालों की आदत छूट जाएगी? आंकड़े बताते हैं कि जिन्हें शराब पीनी है, वे किसी अन्य भट्टी या आसपास के गांव जाकर अपनी लत पूरी करेंगे; नशा करने वालों की तादाद कम होने के बजाय अक्सर बढ़ती ही है। ऐसे में यदि इस धरने का उद्देश्य वाक़ई समाज सुधार है, तो पूरे अंचल में ‘संपूर्ण शराबबंदी’ की मांग क्यों नहीं की जा रही? पूरे क्षेत्र को छोड़कर केवल एक भट्टी को निशाना बनाना इसके सामाजिक उद्देश्य को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है।

5. पुरानी राजनीति का नया अखाड़ा

​राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस धरने की पटकथा शराब भट्टी पर नहीं, बल्कि पुरानी राजनीतिक दूरियों पर लिखी गई है। श्री उज्ज्वल सिंह चौहान जी का पहले विधायक जी के ही वैचारिक दल में होना और बाद में आदरणीय रेवनाथ चौरे जी की राजनीतिक विरासत को लेकर हुई कुछ कथित टिप्पणियों के कारण आई दूरियां, इस पूरे विवाद की असल जड़ मानी जा रही हैं। भट्टी तो केवल एक बहाना है, असल में यह अतीत की राजनीतिक कड़वाहटों का सार्वजनिक प्रदर्शन अधिक प्रतीत होता है।

6. नुकसान का गणित: सुरक्षित भविष्य बनाम आम आदमी की दिहाड़ी

​इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि जब कोई भी बड़ा राजनीतिक या व्यापारिक टकराव होता है, तो दोनों सक्षम पक्षों (नेताओं और बड़े व्यापारियों) का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित होता है। धरने में एक दिन जाने या न जाने से उनकी आर्थिक सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन, जो आम नागरिक या किसान इस भीड़ का हिस्सा बनता है, वह अपने खेत का काम, अपनी दिहाड़ी और अपने परिवार का कीमती समय गंवाता है। ऐसे में जनता को यह विचार करना चाहिए कि दो बेहद सक्षम और मजबूत पक्षों की इस लड़ाई में, एक आम आदमी अपने हिस्से का आर्थिक नुकसान क्यों सहे?

निष्कर्ष: समय की कीमत पहचानें

​यह पूरा घटनाक्रम किसी सामाजिक बुराई से लड़ने का अभियान कम और बिना पुख्ता तथ्यों के लड़ी जा रही एक राजनीतिक लड़ाई ज्यादा लगता है। क्षेत्र के किसानों और जागरूक नागरिकों के लिए यह एक मनोवैज्ञानिक आत्ममंथन का समय है। जब विवाद के मूल में ही व्यक्तिगत दूरियां और अधूरे तथ्य हों, तो क्या हमें अपना कीमती समय इसमें नष्ट करना चाहिए? या फिर हमारा पूरा ध्यान अपने खेतों की जुताई, कृषि कार्यों और अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने पर होना चाहिए? इसका फैसला स्वयं जनता के विवेक पर निर्भर है।

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