
पांढुर्ना |किसी भी जिले में कलेक्टर का आदेश सर्वोपरि होता है और उसका पालन करना हर अधिकारी का प्रशासनिक धर्म है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, 26 मई के आसपास आयोजित ‘NCORD’ (एनकॉर्ड) की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक में पांढुर्णा कलेक्टर महोदय ने झोलाछाप डॉक्टरों पर सख्त से सख्त कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। लेकिन ग्राम सिवनी के ‘गीता क्लीनिक’ और उसके संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास पर पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग (BMO) की ‘मखमली’ मेहरबानी देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो निचले स्तर पर इन आदेशों की गंभीरता को समझा ही नहीं जा रहा है।
लगातार पत्रकारिता, रंगे-हाथों वाले वीडियो साक्ष्य, फर्जी डिग्रियों का खुलासा और एक बेबस विधवा के 80 हजार रुपये बर्बाद होने के बाद भी, स्वास्थ्य विभाग की जांच सिर्फ एक ‘पंचनामे’ तक सिमट कर रह गई है। आखिर एक 10वीं पास व्यक्ति को बचाने के लिए पूरा सिस्टम इतना बेबस क्यों है? आइए, अत्यंत विनम्रता के साथ उन 6 सुलगते और गहरे वैधानिक बिंदुओं पर विचार करते हैं, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और इसके पीछे चल रहे बड़े ‘सिंडिकेट’ पर सवाल खड़े करते हैं:
कलेक्टर महोदय के आदेशों की ‘मौन’ अनदेखी: क्या निचले स्तर पर कानून लाचार है?
जब NCORD की बैठक में जिले के सर्वोच्च अधिकारी (कलेक्टर) ने झोलाछापों पर कार्रवाई के स्पष्ट आदेश दे दिए थे, तो फिर बीएमओ साहब ‘गीता क्लीनिक’ पर वैधानिक ताला (सील) जड़ने में इतना संकोच क्यों कर रहे हैं? ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 के तहत बिना लाइसेंस इलाज करना 1 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने का अपराध है। क्या जानबूझकर एफआईआर दर्ज कराने में देरी करना, ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 255 (किसी अपराधी को बचाने के लिए लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना) के संदेह को जन्म नहीं देता? क्या प्रशासन की यह खामोशी कलेक्टर के आदेशों का सीधा उल्लंघन नहीं है?
दवाइयां ‘गायब’ और सिरींज मौजूद: क्या 35 साल से ‘हवा’ का इलाज हो रहा था?
बीएमओ साहब की जांच का सबसे हास्यास्पद पहलू यह रहा कि वहां सिरींज और पर्चियां तो मिलीं, लेकिन डॉ. बिस्वास के पास से एलोपैथिक ‘दवाइयां’ गायब थीं। क्या यह एक ‘अद्भुत संयोग’ है कि जांच से ठीक पहले ‘रात्रिकालीन दौरा’ होता है, क्लीनिक के बोर्ड पर लिखी डिग्रियां मिटाने के लिए रातों-रात ‘पेंट’ पोत दिया जाता है (जो BNS की धारा 238 के तहत साक्ष्य मिटाने का अपराध है), और फिर दवाइयां भी गायब हो जाती हैं? अगर वहां दवाइयां नहीं थीं, तो क्या डॉक्टर साहब 35 साल से बिना दवाइयों के ही ग्रामीण मरीजों को ठीक कर रहे थे?
कुसुम उकार की 80 हजार की गठान: अगर दवा नहीं थी, तो वह ‘जहरीला’ इंजेक्शन किसका था?
दवाइयां न मिलने की इस प्रशासनिक ‘थ्योरी’ की पोल सिवनी की गरीब विधवा कुसुम उकार की दर्दनाक स्थिति खोल देती है। उनका आरोप है कि डॉक्टर द्वारा कमर में लगाए गए एक इंजेक्शन से उन्हें भयंकर इन्फेक्शन हुआ और उसे ठीक कराने में उनके 80 हजार रुपये बर्बाद हो गए। यदि क्लीनिक में दवा नहीं थी, तो वह कौन सा रसायन था जो एक गरीब विधवा के शरीर में इंजेक्ट किया गया? BNS की धारा 116 के तहत गलत इलाज से ऐसा स्थायी नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ (Grievous Hurt) की श्रेणी में आता है। क्या प्रशासन इस गरीब विधवा के आंसुओं का संज्ञान लेगा?
मौत का सामान सप्लाई करने वाली पांढुर्णा की वो ‘होलसेल दुकान’ कौन सी है?
इस पूरे खेल का सबसे बड़ा और विचारणीय पहलू यह है कि बिना किसी वैध मेडिकल लाइसेंस के, इस अपंजीकृत ‘क्लीनिक’ तक इतनी भारी मात्रा में सिरींज, सलाइन की बोतलें और एंटीबायोटिक दवाइयां पहुंच कैसे रही थीं? जन-चर्चाओं में इन दिनों पांढुर्णा की एक बड़ी ‘होलसेल दवा दुकान’ का नाम जोरों पर उछल रहा है, जो कथित तौर पर ऐसे झोलाछापों को यह सारा सामान सप्लाई करती है। एक अपंजीकृत व्यक्ति को दवाइयां बेचना नियमों का घोर उल्लंघन है। क्या स्थानीय ड्रग इंस्पेक्टर (Drug Inspector) इस बात की सघन जांच करेंगे कि यह अवैध सप्लाई किस बिल पर और किसके संरक्षण में हो रही थी?
पर्दे के पीछे का वो ‘सेटलमेंट गुरु’ कौन है, जो दे रहा है राजनीतिक संरक्षण?
इतने पुख्ता डिजिटल सबूतों, पंचनामे और खुद डॉक्टर के कुबूलनामे के बावजूद ‘गीता क्लीनिक’ का अब तक सील न होना, एक गहरे राजनीतिक रहस्य की ओर इशारा करता है। पांढुर्णा के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ‘सेटलमेंट गुरु’ का नाम बहुत गूंज रहा है। जन-चर्चा है कि यह कथित ‘सेटलमेंट गुरु’ ही अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर इस अवैध क्लीनिक को बचा रहा है। क्या हमारे जन-प्रतिनिधियों के लिए एक झोलाछाप का ‘वोट-बैंक’ आम जनता की जान से ज्यादा कीमती हो गया है?
ग्रामीणों का ‘आत्मघाती’ वीडियो: प्रशासन को डराने चले थे, खुद ही गवाह बन गए!
प्रशासन पर ‘कानून-व्यवस्था’ बिगड़ने का दबाव बनाने के लिए कुछ लोगों द्वारा एक वीडियो वायरल कराया गया, जिसमें ग्रामीणों ने आंदोलन की चेतावनी दी। लेकिन अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘बूमरैंग’ (अपना ही वार खुद पर भारी पड़ना)। जोश-जोश में ग्रामीणों ने कैमरे पर यह कुबूल कर लिया कि “डॉक्टर साहब सालों से हमारा इलाज करते हैं।” जब डॉक्टर का खुद का बयान और ग्रामीणों की यह गवाही एक साथ मिलती है, तो यह इस बात का 100% पक्का सरकारी और सार्वजनिक साक्ष्य बन जाता है कि वहां अवैध मेडिकल प्रैक्टिस चल रही थी। अब इस सच को कोई कैसे झुठला सकता है?
निष्कर्ष: ‘पांढुर्णा वॉच’ का अटल संकल्प
पंचनामा एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन यह अंतिम न्याय नहीं है। ‘पांढुर्णा वॉच’ का शंखनाद तब तक जारी रहेगा, जब तक कलेक्टर महोदय के आदेशों का पूर्णतः पालन करते हुए ‘गीता क्लीनिक’ को विधिवत सील नहीं किया जाता और सुसंगत धाराओं में FIR दर्ज नहीं होती। सोचिए… और अपने प्रशासन से जवाब मांगिए!
जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory/Legal Disclaimer):
यह समाचार पूर्णतः प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों, पीड़ित मरीजों के बयानों, स्थानीय जन-चर्चाओं, पंचनामे के तथ्यों और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (BNS, NMC Act, MP Clinical Establishment Act) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी, संस्था या होलसेल विक्रेता पर निराधार आरोप लगाना नहीं है, बल्कि जनस्वास्थ्य के मूल अधिकार की रक्षा हेतु प्रशासन की जवाबदेही तय करना और आम जनता को जागरूक करना है। खबर में लगाए गए सभी आरोप ‘प्रश्नवाचक (?)’ शैली में जनहित के सवाल मात्र हैं, जिनकी सत्यता की पुष्टि और आगे की वैधानिक कार्रवाई करना सक्षम प्राधिकारियों का कर्तव्य है।

