
पांढुर्ना| एक स्वस्थ लोकतंत्र में जब कोई मीडिया संस्थान पुख्ता साक्ष्यों के साथ किसी व्यवस्थागत खामी को उजागर करता है, तो प्रशासन से त्वरित न्याय की उम्मीद की जाती है। पिछले कुछ हफ्तों से लगातार ‘पांढुर्णा वॉच’ ने ग्राम सिवनी के ‘गीता क्लीनिक’ की अवैधानिकता को डिजिटल साक्ष्यों के साथ सामने रखा है। लिखित शिकायतें हुईं, बीएमओ (BMO) कार्यालय में बात हुई, यहां तक कि कलेक्टर महोदय की ‘जनसुनवाई’ में भी मामला रखा गया।
आज स्थिति यह है कि सारे तथ्य उजागर होने के बाद एक छोटा सा बच्चा भी बता देगा कि यह क्लीनिक बिना मान्यता के चल रहा है। फिर भी, प्रशासन की समझ में यह बात क्यों नहीं आ रही है, यह एक बड़ा रहस्य है। हमारा उद्देश्य किसी भी अधिकारी या व्यक्ति पर आरोप लगाना नहीं है। लेकिन आइए, 7 ऐसे सीधे और वैधानिक बिंदुओं पर विचार करें जो हर नागरिक के मन में यह सवाल उठाते हैं कि क्या हमारे सिस्टम में न्याय की प्रक्रिया इतनी ही जटिल है?
साक्ष्यों का पहाड़ और ‘इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस’:
25 अप्रैल का वह जिओ-टैग वीडियो जिसमें बिना वैध डिग्री के इलाज किया जा रहा है, सभी के सामने है। ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ (BSA) की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड न्यायालय और प्रशासन के समक्ष एक पुख्ता सबूत माना जाता है। इतने पारदर्शी साक्ष्यों के बावजूद प्रशासन के कदम क्यों ठिठके हुए हैं?
बीएमओ की जांच और ‘स्वयं का कुबूलनामा’:
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने मौके पर जाकर सिरींज और पर्चियां जब्त कीं। कैमरे और पंचनामे में यह कुबूलनामा भी दर्ज हुआ कि डॉक्टर के पास एलोपैथी का कोई लाइसेंस नहीं है। ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट 2019 की धारा 34 के तहत बिना वैध पंजीकरण के चिकित्सा करना 1 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने वाला अपराध है। जुर्म कुबूल होने के बाद भी क्लीनिक को सील करने में कैसी कानूनी अड़चन है?
10वीं पास की शिक्षा और अमान्य डिग्रियों का सच:
दस्तावेजों से यह सर्वविदित हो चुका है कि संबंधित व्यक्ति मात्र 10वीं पास (थर्ड डिवीजन) है और उनके पास मौजूद ‘IBAM कोलकाता’ के सर्टिफिकेट को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने वर्षों पहले ‘फर्जी’ घोषित कर रखा है। क्या इतने स्पष्ट वैधानिक तथ्यों के बाद भी कोई जांच शेष रह जाती है?
कुसुम उकार की व्यथा और ‘घोर उपहति’ के प्रावधान:
एक गरीब विधवा महिला कुसुम उकार को गलत इंजेक्शन से हुए भयंकर इन्फेक्शन के कारण 80 हजार रुपये कर्ज लेकर अपना इलाज कराना पड़ा। ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 116 के तहत शरीर को ऐसा स्थायी नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ (Grievous Hurt) की श्रेणी में आता है। क्या एक बेबस पीड़ित के दर्द के बाद भी सिस्टम की खामोशी नहीं टूटनी चाहिए?
‘किराये’ का भवन और नर्सिंग होम एक्ट का स्पष्ट नियम:
यह भी सामने आ चुका है कि क्लीनिक एक किराये के मकान में संचालित है। ‘मध्य प्रदेश उपचर्यागृह तथा रुजोपचार संबंधी स्थापनाएं अधिनियम’ के तहत बिना पंजीकरण किसी भी क्लीनिक का संचालन पूर्णतः अवैध है। कानून में सीलिंग के स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद कार्रवाई का पहिया क्यों अटका है?
जनसुनवाई और लिखित शिकायतों का लंबा सफर:
मीडिया की लगातार खबरों के साथ-साथ प्रशासन को कई बार मौखिक और लिखित शिकायतें दी गईं। यहां तक कि जिले की सबसे बड़ी प्रशासनिक चौखट यानी ‘जनसुनवाई’ में भी सारे सुबूतों के साथ आवेदन दिया जा चुका है। जब सारे वैधानिक दरवाजे खटखटा लिए गए हैं, तो फिर ‘गीता क्लीनिक’ के दरवाजे पर सरकारी ताला (सील) क्यों नहीं लटक रहा?
आम आदमी के लिए सबसे बड़ा और चिंताजनक सवाल:
यह बिंदु किसी की शिकायत का नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चिंता का है। जरा सोचिए! जब एक मामले में स्पष्ट वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं, सरकारी पंचनामा बन चुका है, डिग्रियों की सच्चाई खुल चुकी है और जनसुनवाई में गुहार लगाई जा चुकी है— फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। तो क्या इस व्यवस्था में एक आम और गरीब आदमी की रोजमर्रा की परेशानियां कभी आसानी से हल होती होंगी? यदि इतने सबूतों के बाद भी न्याय के लिए तरसना पड़े, तो आम आदमी अपनी गुहार लेकर कहां जाएगा?
निष्कर्ष:
’पांढुर्णा वॉच’ का काम प्रशासन पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि समाज के सामने तथ्य रखकर उन्हें जागरूक करना है। अब यह तय करना सक्षम अधिकारियों का काम है कि वे इन 100% पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर कानून का राज स्थापित करते हैं, या फिर आम जनता को यूं ही सोचने पर मजबूर छोड़ देते हैं।
वैधानिक उद्घोषणा (Legal Disclaimer):
यह समाचार पूर्णतः प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों, पीड़ित मरीजों के बयानों, बीएमओ की जांच रिपोर्ट और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (BNS, NMC Act, MP Clinical Establishment Act) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या अधिकारी पर निराधार आरोप लगाना नहीं है, बल्कि जनहित में सवाल उठाकर प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देना है।

