कलेक्टर के कड़े रुख के बाद भी ‘गीता क्लीनिक’ पर कार्रवाई में ‘संकोच’ क्यों? डेढ़ महीने की खोजी पत्रकारिता और जनसुनवाई की शिकायतों पर प्रशासनिक मौन का बड़ा विश्लेषण!

पांढुर्ना |​किसी भी जिले में कानून व्यवस्था और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टर के आदेश सर्वोपरि और बाध्यकारी होते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, पांढुर्णा कलेक्टर महोदय ने ‘NCORD’ (एनकॉर्ड) की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक में झोलाछाप डॉक्टरों और अवैध रूप से संचालित क्लीनिकों पर सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए थे। लेकिन ग्राम सिवनी के ‘गीता क्लीनिक’ और उसके संचालक के मामले में पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को देखकर यह गंभीर यक्ष-प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर निचले स्तर पर इन आदेशों की गंभीरता को अमलीजामा पहनाने में इतनी शिथिलता क्यों बरती जा रही है?

​लगातार डेढ़ महीने की खोजी पत्रकारिता, रंगे-हाथों वाले वीडियो साक्ष्य, कथित फर्जी डिग्रियों के दस्तावेज और जनसुनवाई में की गई औपचारिक लिखित शिकायतों के बावजूद, अब तक की कार्रवाई महज कागजी ‘पंचनामे’ और खानापूर्ति तक ही सीमित नजर आती है। आखिर वो कौन से कारण हैं कि इतनी वैधानिक शिकायतों के बाद भी तंत्र ठोस कदम उठाने से कतरा रहा है? आइए, पूर्णतः जनहित और कानून के दायरे में रहते हुए उन तीखे और वैधानिक बिंदुओं पर विचार करते हैं, जो सीधे तौर पर वर्तमान प्रशासनिक इच्छाशक्ति को कटघरे में खड़ा करते हैं:

 कलेक्टर महोदय के आदेशों की ‘मौन’ अनदेखी: क्या निचले स्तर पर कानून बेबस है?

​जब जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर) ने जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले तत्वों पर तत्काल और कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए थे, तो स्वास्थ्य विभाग ‘गीता क्लीनिक’ पर विधिवत वैधानिक ताला (सील) जड़ने और एफआईआर (FIR) दर्ज कराने में इतना संकोच क्यों कर रहा है? ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 के तहत बिना वैध लाइसेंस और पंजीकरण के चिकित्सा अभ्यास करना एक गंभीर दंडनीय अपराध है। ऐसे में सवाल उठता है कि पर्याप्त सबूत मिलने के बाद भी एफआईआर दर्ज करने में होने वाली यह देरी, क्या ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 255 (किसी अपराधी को बचाने के लिए लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना) के संदेह को आम जनता के मन में जन्म नहीं देती?

 रातों-रात साक्ष्य गायब होने का रहस्य: क्या यह केवल एक ‘अद्भुत संयोग’ है?

​जांच टीम की रिपोर्ट और निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि वहां कुछ मेडिकल सामग्रियां तो मिलीं, लेकिन मुख्य एलोपैथिक दवाइयां गायब थीं। इसके साथ ही क्लीनिक के बोर्ड पर लिखी डिग्रियों को मिटाने के लिए रातों-रात पेंट पोत दिया गया। कानूनन, ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 238 के तहत किसी भी संभावित कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए साक्ष्यों को नष्ट करना या छिपाना एक गंभीर अपराध है। सवाल यह है कि जांच से ठीक पहले क्लीनिक का रूप-रंग बदल जाना और दवाइयों का गायब हो जाना क्या विभागीय सूचनाओं के लीक होने की ओर इशारा करता है? आखिर इस कथित ‘क्लीनिक’ को साक्ष्य मिटाने का समय और अवसर कैसे मिला?

 पीड़ित मरीजों की लिखित गुहार और जनसुनवाई की शिकायतें: फाइलों में क्यों दफन है न्याय?

​सिवनी की एक बेबस पीड़ित महिला द्वारा जनसुनवाई में दी गई लिखित शिकायत और वीडियो बयानों के अनुसार, कथित गलत इलाज और इंजेक्शन के कारण उन्हें गंभीर शारीरिक व आर्थिक नुकसान (करीब 80 हजार रुपये) झेलना पड़ा। ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 116 के तहत बिना योग्यता के ऐसा इलाज करना जिससे किसी के स्वास्थ्य को स्थायी या गंभीर क्षति पहुंचे, ‘घोर उपहति’ (Grievous Hurt) की श्रेणी में आता है। जब पीड़ित स्वयं सामने आकर गुहार लगा रहा है और जनसुनवाई जैसे सर्वोच्च मंच पर शिकायत दर्ज है, तो स्वास्थ्य विभाग इस मानवीय और वैधानिक पहलू पर त्वरित एफआईआर दर्ज कराने से पीछे क्यों हट रहा है?

अवैध मेडिकल सप्लाई चेन: पांढुर्णा की उस ‘होलसेल दुकान’ पर कार्रवाई से परहेज क्यों?

​बिना किसी वैध ड्रग लाइसेंस और क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन के, इस अनधिकृत स्थान तक भारी मात्रा में सिरींज, सलाइन बोतलें और अनुशंसित एलोपैथिक दवाइयां आखिर कैसे पहुंच रही थीं? नियमानुसार, किसी भी अपंजीकृत व्यक्ति या अवैध क्लीनिक को थोक या खुदरा मात्रा में जीवन रक्षक दवाइयां बेचना ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट का खुला उल्लंघन है। स्थानीय जन-चर्चाओं में पांढुर्णा की एक प्रतिष्ठित होलसेल दवा दुकान का नाम सामने आ रहा है। सवाल उठता है कि ड्रग इंस्पेक्टर (Drug Inspector) और संबंधित प्राधिकारी इस अवैध सप्लाई चेन की जड़ तक जाने के लिए उक्त होलसेल दुकान के बिलों और स्टॉक की सघन जांच करने से क्यों कतरा रहे हैं?

 कथित ‘सेटलमेंट’ और राजनीतिक संरक्षण की गूंज: क्या जनस्वास्थ्य पर रसूख भारी है?

​तमाम पुख्ता डिजिटल साक्ष्यों, पंचनामे और मौके की परिस्थितियों के बावजूद अब तक इस मामले का किसी तार्किक परिणति (जैसे पूर्ण सीलिंग और जेल) तक न पहुंचना, व्यवस्था के भीतर किसी अदृश्य प्रभाव की ओर संकेत करता है। पांढुर्णा के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पर्दे के पीछे से कोई रसूखदार तत्व इस पूरे मामले को रफा-दफा करने या ‘सेटलमेंट’ कराने का प्रयास कर रहा है। सवाल यह है कि क्या हमारे नीति-निर्माताओं और जिम्मेदार अधिकारियों के लिए आम जनता की अमूल्य जान से ज्यादा जरूरी किसी कथित सिंडिकेट का संरक्षण हो गया है?

 वायरल वीडियो और सार्वजनिक कुबूलनामा: जब ग्रामीण खुद बन गए सबसे बड़े गवाह!

​प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करने या दबाव बनाने के उद्देश्य से कुछ तत्वों द्वारा एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया, जिसमें कुछ लोग कार्रवाई के विरोध में आंदोलन की बात कह रहे हैं। लेकिन वैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो इस वीडियो में ग्रामीणों ने स्वयं कैमरे के सामने यह स्वीकार कर लिया कि “उक्त व्यक्ति सालों से उनका इलाज कर रहा है।” मध्य प्रदेश क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत यह वीडियो बयान इस बात का सबसे अचूक और सार्वजनिक साक्ष्य बन चुका है कि वहां बिना पंजीकरण के वर्षों से मेडिकल प्रैक्टिस की जा रही थी। जब आरोपी के पक्ष में बनाए गए वीडियो से ही अपराध की पुष्टि हो रही है, तो कानून विशेषज्ञों के अनुसार प्रशासन को तत्काल संज्ञान लेकर कड़ी वैधानिक कार्रवाई करने में अब क्या तकनीकी अड़चन है?

निष्कर्ष: ‘पांढुर्णा वॉच’ का जनहित में अटल संकल्प

​प्रशासनिक स्तर पर किया गया पंचनामा केवल एक प्राथमिक प्रक्रिया है, इसे संपूर्ण न्याय नहीं माना जा सकता। ‘पांढुर्णा वॉच’ जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की इस पूरी कार्रवाई की पल-पल की निगरानी कर रहा है। जब तक कलेक्टर महोदय के जनहितैषी आदेशों का अक्षरशः पालन करते हुए इस पूरे नेटवर्क पर कानून का चाबुक नहीं चलता और संबंधितों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में कड़ी एफआईआर दर्ज नहीं होती, तब तक जनहित के ये तीखे सवाल लगातार पूछे जाते रहेंगे। लोकतंत्र में जवाबदेही ही सुशासन की पहली शर्त है!

जनहित में वैधानिक उद्घोषणा :

​यह समाचार रिपोर्ट पूर्णतः स्थानीय नागरिकों के लिखित व वीडियो बयानों, जनसुनवाई में प्रस्तुत औपचारिक शिकायतों, स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैयार किए गए प्राथमिक पंचनामे के तथ्यों और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (BNS, NMC Act, MP Clinical Establishment Act) के रचनात्मक व विश्लेषणात्मक मूल्यांकन पर आधारित है। इस प्रकाशन का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, शासकीय अधिकारी, राजनेता या व्यावसायिक प्रतिष्ठान की सामाजिक व व्यावसायिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना या उन पर व्यक्तिगत रूप से कोई निराधार लांछन लगाना नहीं है। इस रिपोर्ट में उठाए गए सभी बिंदु ‘प्रश्नवाचक (?)’ शैली में जनहित, जनस्वास्थ्य और प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पूछे गए वैधानिक सवाल मात्र हैं। आरोपों की अंतिम सत्यता की जांच करना, साक्ष्यों का परीक्षण करना और तदनुसार उचित वैधानिक व दंडात्मक कार्रवाई करना पूरी तरह से सक्षम न्यायिक एवं प्रशासनिक प्राधिकारियों का क्षेत्राधिकार और कर्तव्य है।

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