पांढुर्णा की जनता से धोखा: नगर पालिका की संपत्ति किसी नेता की जागीर नहीं, बिना सहमति और टेंडर रातों-रात कैसे ढहा दिए गए सरकारी भवन?

रिपोर्ट: सुनील कवडे | पांढुर्णा वॉच लोकतंत्र में जनता अपने जनप्रतिनिधियों को इसलिए नहीं चुनती कि वे सत्ता में आकर मनमर्जी करें और शहर की संपत्तियों को अपनी निजी जागीर समझ लें। नगर पालिका की एक-एक ईंट, एक-एक लोहे का एंगल और उसकी जमीन पर आम जनता का अधिकार है, किसी नेता या अधिकारी का नहीं। जब शहर में इतना बड़ा बदलाव किया जा रहा था, एक नया कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना थी, तो जनता को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? शहर के विकास का कोई विरोध नहीं करता, लेकिन विकास की आड़ में जो ‘प्रशासनिक और कानूनी खेल’ खेला गया है, वह जनता के भरोसे का सीधा कत्ल है।

​बिना किसी को कानो-कान खबर किए, रातों-रात पुराने फायर स्टेशन, साइंस कॉलेज और पुराने सीएमओ बंगले को पोकलेन लगाकर जमींदोज कर दिया गया। किसी भी बड़े फैसले से पहले जन-सहमति, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है। लेकिन पांढुर्णा में ऐसा लगता है जैसे नियमों की किताब को ही ताक पर रख दिया गया है। आइए, कानूनी नजरिए से उन 8 धारदार बिंदुओं को समझते हैं, जो साबित करते हैं कि आपके (जनता के) साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है और पर्दे के पीछे की असली मंशा क्या है:

इस पूरे ‘प्रशासनिक खेल’ को बेनकाब करते 8 ठोस बिंदु

1. जनप्रतिनिधि सेवक हैं, मालिक नहीं: बिना प्रस्ताव यह मनमानी कैसे?

कानून बिल्कुल स्पष्ट है—नगर पालिका की किसी भी संपत्ति को हटाने या नया निर्माण करने से पहले पीआईसी (PIC) और सामान्य सभा में प्रस्ताव पारित होना चाहिए। चर्चा है कि इस इतनी बड़ी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का कोई विधिवत प्रस्ताव ही पास नहीं हुआ। क्या प्रशासन और चुने हुए नुमाइंदे खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं? बिना प्रस्ताव के सरकारी भवनों पर मशीनें चलाना सीधे तौर पर पद और अधिकारों का दुरुपयोग है।

2. कानून की आंखों में धूल: जांच से बचने के लिए ‘श्मशान’ की धारा का उपयोग!

यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी फर्जीवाड़ा प्रतीत होता है। जर्जर या खतरनाक भवन को गिराने के लिए ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ (इंजीनियरिंग जांच) के साथ मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम की धारा 222 का प्रयोग किया जाना चाहिए। लेकिन इस जांच और प्रक्रिया से बचने के लिए, कथित तौर पर धारा 123 (1) (छ) का हवाला दिया गया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह धारा ‘श्मशान और कब्रिस्तान’ के रखरखाव से जुड़ी है! क्या नगर पालिका का कानूनी अमला इतना अक्षम है, या यह जानबूझकर रची गई एक चालाकी है?

3. लाखों के मलबे की गुमशुदगी: जनता की संपत्ति की सरेआम लूट

जब सरकारी भवन टूटता है, तो उसका मलबा (लोहा, ईंट, दरवाजे, लकड़ी) जनता की संपत्ति होता है। नियमों के अनुसार, लोक निर्माण विभाग (PWD) से इसका मूल्यांकन कराकर सार्वजनिक नीलामी (Tender) निकाली जाती है, ताकि वह पैसा शहर के विकास के लिए नगर पालिका के खाते में आए। बिना टेंडर निकाले यह मलबा रातों-रात कहां गायब हो गया? इसे बिना प्रक्रिया किसे बेचा गया? यह राजस्व का नुकसान नहीं, बल्कि व्यवस्था में बैठी दीमकों द्वारा जनता के खजाने में लगाई गई सरेआम सेंध है।

4. मशीनरी का लाखों का बिल: नुकसान हमारा, मुनाफा किसी और का

एक तरफ मलबे से होने वाली आय को दरकिनार कर दिया गया, वहीं भवनों को ढहाने में लगी निजी पोकलेन और जेसीबी मशीनों का भारी-भरकम बिल नगर पालिका के खजाने (यानी जनता के टैक्स) पर डाल दिया गया। जनता अपने खून-पसीने की कमाई से टैक्स इसलिए नहीं देती कि अधिकारी और नेता बिना कानूनी प्रक्रिया के उसे अपनी मर्जी से खर्च करें।

5. शहर की सुरक्षा से खिलवाड़: एक कमरे में सिमटी जीवनरक्षक दमकल सेवा

कॉम्प्लेक्स के लिए जगह खाली करवाने की इतनी हड़बड़ी थी कि प्रशासन ने शहरवासियों की जान को ही दांव पर लगा दिया। फायर ब्रिगेड जैसी महत्वपूर्ण आपातकालीन सेवा को बिना किसी पूर्व योजना के, नपा स्कूल के पीछे एक तंग कमरे में धकेल दिया गया है। यदि शहर के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में कोई बड़ी आगजनी हो जाए, तो क्या इस संकरी जगह से दमकल गाड़ियां समय पर निकल पाएंगी? क्या किसी ‘प्रोजेक्ट’ की कीमत लोगों की जान से ज्यादा है?

6. विपक्ष का ‘मौन व्रत’: क्या इस खेल में सबकी मूक सहमति है?

लोकतंत्र में जब सत्ता पक्ष कोई नियम तोड़ता है, तो विपक्ष का काम सड़क पर उतरना होता है। लेकिन पांढुर्णा में इतनी बड़ी वैधानिक अनियमितता हो गई और विपक्ष में बैठे जिम्मेदार जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए हैं। कोई आपत्ति नहीं, कोई धरना नहीं! यह रहस्यमयी चुप्पी इशारा करती है कि इस कॉम्प्लेक्स की नींव में शायद दोनों पक्षों की अघोषित और मूक सहमति (Silent Agreement) दबी हुई है।

7. वरिष्ठ अधिकारियों की खामोशी: क्या सब कुछ ‘ऊपर’ तक सेट है?

पांढुर्णा अब जिला बन चुका है। आला अधिकारियों के कार्यालय यहीं हैं। शहर के बीचों-बीच बिना सही धारा और बिना टेंडर के सरकारी संपत्तियां जमींदोज कर दी गईं। यह कैसे संभव है कि इतने बड़े प्रशासनिक अमले को इसकी भनक न लगे? यदि सब जानकर भी वे खामोश हैं, तो यह जनता के लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी है कि उनकी शिकायतें सुनने वाला अब कोई नहीं बचा।

8. व्यावसायिक परिसर का ‘असली’ गणित: कॉम्प्लेक्स के पीछे का छिपा हुआ लाभ

आखिर इस जगह को इतनी जल्दबाजी में क्यों खाली कराया गया? जनता को समझना होगा कि व्यावसायिक परिसर (Commercial Complex) के निर्माण में सिर्फ विकास नहीं, बल्कि एक बड़ा अर्थशास्त्र छिपा होता है। दुकानों का आवंटन, ठेके की प्रक्रिया और प्रीमियम की राशि—ये वे रास्ते हैं जहां रसूखदार अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। क्या इस ‘विकास’ की आड़ में किसी भावी ‘लाभ’ की जमीन तैयार की जा रही है?

निष्कर्ष:

पांढुर्णा की जनता को अब जागना होगा। यह केवल एक बिल्डिंग के गिरने का मामला नहीं है, यह आपके अधिकारों, आपके टैक्स के पैसों और आपकी सुरक्षा का मामला है। जब तक आप सवाल नहीं पूछेंगे, टेंडर और प्रस्ताव की कॉपी नहीं मांगेंगे, तब तक ये जनप्रतिनिधि और अधिकारी आपको और आपकी संपत्तियों को यूं ही अपनी जागीर समझते रहेंगे।

वैधानिक डिस्क्लेमर (Legal Disclaimer):

यह समाचार रिपोर्ट पांढुर्णा शहर में चल रही जनचर्चाओं, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, और प्रशासनिक कार्यप्रणाली में देखी जा रही प्रथम दृष्टया (Prima Facie) प्रक्रियात्मक विसंगतियों के आधार पर जनहित में प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी भी अधिकारी, जनप्रतिनिधि या व्यक्ति विशेष की छवि धूमिल करना या उन पर बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आरोप लगाना नहीं है। एक जिम्मेदार न्यूज़ पोर्टल के तौर पर हमारा उद्देश्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रियाओं के पालन पर सवाल उठाना है। यदि नगर पालिका प्रशासन या संबंधित पक्ष के पास इस ध्वस्तीकरण से संबंधित पीआईसी/परिषद का प्रस्ताव, मलबे की नीलामी का टेंडर और सही कानूनी धाराओं के प्रयोग के वैध दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो पत्रकारिता के मानदंडों के अनुसार उनका पक्ष भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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