पांढुर्णा का 30 करोड़ का ‘खामोश’ खेल: ताकतवर सत्ता के आगे बौनी हुई लाचार जनता, क्या बच्चों के भविष्य की कब्र पर खड़ा होगा यह ‘गैर-जरूरी’ कमर्शियल परिसर?

पांढुर्ना :सुनील कवडे | पांढुर्णा वॉच पांढुर्णा गहरी नींद में था और ताकतवर सत्ता के बुलडोजर शहर के सीने पर बेखौफ गरज रहे थे। पुराना फायर स्टेशन, साइंस कॉलेज और सीएमओ बंगला—जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करते थे—सुबह होते-होते मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। यह कोई सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी; यह इस बात का क्रूर प्रदर्शन था कि आज के दमदार राजनेताओं और रसूखदारों के सामने आम जनता और उसकी भावनाएं कितनी छोटी, कितनी बौनी और कितनी लाचार हो चुकी हैं।

​इस पूरी खौफनाक तस्वीर का सबसे दुखद पहलू यह है कि हमने खुद अपने प्रतिनिधियों को इतना ताकतवर बना दिया है कि वे अब हमें केवल ‘वोटर’ समझते हैं, नागरिक नहीं। आइए, 30,000 स्क्वायर फीट के उस अर्थशास्त्र और कानूनी खिलवाड़ को समझते हैं, जो आपको यह एहसास दिलाएगा कि सत्ता के इस खेल में एक आम आदमी की असल हैसियत क्या रह गई है:

 30 करोड़ की ‘प्राइम लोकेशन’ और लाचार जनता की बेबसी

​जिस जगह को रातों-रात मलबे में बदला गया, वह शहर के हृदय स्थल पर स्थित लगभग 30,000 स्क्वायर फीट की बेशकीमती जमीन है। पांढुर्णा के मुख्य बाजार में आज जमीन का भाव करीब ₹10,000 प्रति स्क्वायर फीट है। इस 30 करोड़ रुपये की जमीन पर एक ऐसे कमर्शियल कॉम्प्लेक्स को थोपा जा रहा है, जिसकी इस शहर को दूर-दूर तक कोई आवश्यकता नहीं थी। हम और आप इतने बेबस हैं कि हमारी आंखों के सामने हमारी ही 30 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति को ‘व्यावसायिक मुनाफे’ के लिए खाली करा लिया गया, और हम कुछ नहीं कर सकते। दुकानों की नीलामी और प्रीमियम के इस भारी-भरकम खेल में आम आदमी की हैसियत सिर्फ एक मूकदर्शक की है।

 हमारे बच्चों के पॉलिटेक्निक की जगह छिन गई, और हम देखते रह गए

​एक माता-पिता के तौर पर सोचकर देखिए—पांढुर्णा अब जिला है। शहर के बीचों-बीच स्थित इस प्राइम लोकेशन पर हमारे बच्चों के लिए भविष्य का कोई बड़ा ‘पॉलिटेक्निक कॉलेज’, ‘नर्सिंग संस्थान’ या ‘स्मार्ट लाइब्रेरी’ बन सकती थी। लेकिन ताकतवर राजनेताओं ने शिक्षा और युवाओं के भविष्य को दरकिनार कर दुकानों को चुना। भविष्य में जब युवाओं के लिए कोई अच्छी संस्था आएगी, तो इस शहर में एक इंच जगह नहीं बचेगी। बचेगा तो बस वह कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, जिसकी नींव में हमारे बच्चों का भविष्य दफन है।

 ‘दमदार’ नेताओं पर कार्रवाई? यह सिर्फ एक भ्रम है

​जनता को अब यह मार्मिक और कड़वा सच स्वीकार कर लेना चाहिए कि इस मामले में किसी भी नेता या अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं होने वाली। यह बात बिल्कुल तय है। सत्ता का रसूख इतना दमदार है कि ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी व्यवस्था में ‘उन्हीं के लोग’ बैठे हैं। उन्हें जो करना है, वे अपनी मर्जी से करके रहेंगे। हमारी हैसियत इतनी छोटी कर दी गई है कि 30 करोड़ की वैधानिक अनियमितता पर भी कोई जांच की फाइल नहीं खुलेगी।

 कानून का सरेआम मखौल: धारा 222 की जगह श्मशान की धारा 123(1)(छ)

​कानून और नियम सिर्फ आम आदमी को डराने के लिए रह गए हैं। मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम कहता है कि जर्जर भवन को गिराने से पहले ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ और धारा 222 का उपयोग होना चाहिए। लेकिन इस 30 करोड़ के खेल में प्रथम दृष्टया धारा 123 (1) (छ) का हवाला दिया गया प्रतीत होता है, जो ‘श्मशान और कब्रिस्तान’ के रखरखाव से जुड़ी है! पांढुर्णा जैसे जीवित शहर के दिल को खाली कराने के लिए श्मशान की धारा का उपयोग यह साबित करता है कि ताकतवर लोगों के लिए कानून सिर्फ रबर का खिलौना है, जिसे वे अपनी सुविधानुसार मोड़ सकते हैं।

 पीआईसी (PIC) का प्रस्ताव और मलबे का ई-टेंडर नदारद

​नगर पालिका अधिनियम के तहत किसी भी सरकारी संपत्ति को हटाने के लिए ‘प्रेसिडेंट इन काउंसिल’ (PIC) और सामान्य सभा का स्पष्ट प्रस्ताव अनिवार्य है। चर्चा है कि बिना किसी विधिवत प्रस्ताव के ही मशीनें चला दी गईं। इतना ही नहीं, जो मलबा (लोहा, ईंट, लकड़ी) निकला, वह जनता की संपत्ति था। नियमानुसार PWD से इसका मूल्यांकन कराकर सार्वजनिक ई-नीलामी (e-Tender) होनी चाहिए थी। बिना टेंडर के वह लाखों का मलबा रातों-रात कहां चला गया? यह आम आदमी के टैक्स के पैसों की सरेआम डकैती है, और हम इतने लाचार हैं कि सवाल भी नहीं पूछ सकते।

एक तंग कमरे में हमारी सुरक्षा: फायर ब्रिगेड की दुर्दशा

​दुकानों और कॉम्प्लेक्स के लिए जगह खाली करवाने की ऐसी जल्दबाजी थी कि शहरवासियों की जान को ही दांव पर लगा दिया गया। हमारी आपातकालीन ‘फायर ब्रिगेड’ को नगर पालिका स्कूल के पीछे एक तंग कमरे में धकेल दिया गया है। राजनेताओं के लिए किसी कमर्शियल परिसर की अहमियत इतनी ज्यादा है कि उसके सामने पांढुर्णा के नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा की कीमत उनके लिए शून्य हो गई है।

विपक्ष की रहस्यमयी खामोशी: वरुड़ रोड के ‘शेर’ आज शांत क्यों हैं?

​पांढुर्णा की जनता भूली नहीं है कि जब कलेक्टर कार्यालय को वरुड़ रोड शिफ्ट किया जा रहा था, तब इसी विपक्ष ने जनहित याचिका (PIL) लगाकर आसमान सिर पर उठा लिया था। आज जब 30 करोड़ की जमीन का स्वरूप बदल रहा है, तो यह ‘श्मशान जैसी शांति’ क्यों? यह खामोशी एक ही बात चीख-चीख कर कह रही है—जब लाभ बड़ा हो, तो पक्ष और विपक्ष एक हो जाते हैं, और हारती सिर्फ वह बेचारी जनता है जो इन पर भरोसा करती है।

एक मार्मिक अपील, जिसे हर नागरिक को याद रखना है:

​यह रिपोर्ट किसी से सड़क पर उतरकर हंगामा करने की अपील नहीं कर रही है, क्योंकि यह हम सब जानते हैं कि इन दमदार रसूखदारों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। व्यवस्था इतनी ताकतवर है कि वह हमारे हर विरोध को कुचल देगी।

​लेकिन, जब भी आप इस खाली पड़ी 30 करोड़ की जमीन से गुजरें, तो अपने बच्चों की तरफ देखकर बस इतना याद रखिएगा कि यह उनके भविष्य के ‘पॉलिटेक्निक कॉलेज’ की जगह थी, जिसे आपके ही चुने हुए नेताओं ने एक गैर-जरूरी परिसर के लिए छीन लिया। और जब अगली बार चुनाव का समय आए, जब ये ताकतवर नेता हाथ जोड़कर आपके दरवाजे पर खड़े हों, तो यह बेबसी अपने जेहन में जिंदा रखिएगा। उस एक दिन के लिए जब ताकत आपके हाथ में (EVM पर) होगी, तब यह याद रखिएगा कि उन्होंने आपको और आपके शहर को कितना छोटा समझा था।वै

धानिक डिस्क्लेमर (Strict Legal Disclaimer):

​यह समाचार रिपोर्ट पूर्णतः जनहित में, सार्वजनिक डोमेन में चल रही चर्चाओं, बाजार के वर्तमान मूल्यांकनों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली में प्रथम दृष्टया (Prima Facie) दृष्टिगोचर हो रही प्रक्रियात्मक विसंगतियों के आधार पर प्रकाशित की गई है। रिपोर्ट में उल्लिखित संपत्तियों का मूल्य बाजार के अनुमानित रुझानों पर आधारित है।

​इस लेख का उद्देश्य किसी भी अधिकारी, जनप्रतिनिधि, संस्था या व्यक्ति विशेष पर कोई आपराधिक आरोप (Criminal Allegation), भ्रष्टाचार का सीधा लांछन या उनकी छवि को व्यक्तिगत रूप से आहत करना बिल्कुल नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और एक जिम्मेदार प्रेस के रूप में हमारा उद्देश्य केवल प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability), वैधानिक प्रक्रियाओं के पालन और पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था से सवाल उठाना है। यदि नगर पालिका प्रशासन या संबंधित पक्ष के पास इस ध्वस्तीकरण से संबंधित पीआईसी का वैध प्रस्ताव, मलबे की नीलामी की सार्वजनिक निविदा (Tender) और सही वैधानिक धाराओं के प्रयोग के पुख्ता सरकारी दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो ‘पांढुर्णा वॉच’ उनके पक्ष को भी पूर्ण निष्पक्षता और प्रमुखता के साथ प्रकाशित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

और पढ़ें

और पढ़ें