
पांढुर्ना |गुरु पूर्णिमा का महापर्व जैसे-जैसे समीप आ रहा है, पांढुर्णा की फिजाओं में एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगा है। नगर की हर गली, हर चौराहा सिर्फ एक ही जयघोष से गुंजायमान है— “भजलो दादाजी का नाम, भजलो हरिहरजी का नाम…”। इस अलौकिक स्वर के साथ ही, गुरु के प्रति अटूट समर्पण और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक, पांढुर्णा से खंडवा (श्री दादाजी धाम) तक जाने वाली ऐतिहासिक और पावन निशान यात्रा का विधिवत शंखनाद हो चुका है। जब हजारों श्रद्धालु एक स्वर में गाते हैं, “छोड़ेंगे ना हम दरबार ओ दादाजी… मरते दम तक…”, तो सुनने वाले हर व्यक्ति का हृदय भावविभोर हो उठता है। यह मात्र एक यात्रा नहीं, बल्कि 74 वर्षों से निरंतर बह रही आस्था, उल्लास और विश्व कल्याण की वह अमृतधारा है, जो हर वर्ष समाज को प्रेम, शांति और अनुशासन का महान संदेश देती है।
आस्था के इस महाकुंभ के 6 अत्यंत प्रेरक और मुख्य बिंदु:
1. 74 वर्षों की जीवंत विरासत: पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ता गुरु-प्रेम
पांढुर्णा से श्री दादाजी धाम तक निशान ले जाने की यह गौरवशाली परंपरा 1954 में स्वर्गीय घनश्याम भाऊ चउत्रे जी के पुनीत संकल्प के साथ शुरू हुई थी। समय के साथ यह आस्था का वटवृक्ष और भी विशाल होता गया। स्वर्गीय मनोहर अरमरकर जी ने इस सेवा को सींचा और आज उनके सुपुत्र पीयूष मनोहर अरमरकर उसी असीम श्रद्धा के साथ इस ज्योति को जलाए हुए हैं। यह यात्रा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची भक्ति समय की सीमाओं से परे होती है।
2. 350 किलोमीटर का नंगे पैर महासफर: तप, त्याग और उल्लास का संगम
पांढुर्णा से खंडवा धाम की लगभग 350 किलोमीटर की दूरी श्रद्धालु नंगे पैर, नाचते-गाते और गुरु महिमा का गुणगान करते हुए तय करते हैं। करीब एक माह की इस पदयात्रा में थकान का नामोनिशान नहीं होता, बल्कि हर कदम के साथ ऊर्जा दोगुनी होती जाती है। मार्ग में पड़ने वाले हर गांव-शहर में इन भक्तों का पलक पांवड़े बिछाकर भव्य स्वागत किया जाता है। रास्ते भर चलने वाले भजन-कीर्तन और सेवा कार्य इस यात्रा को एक चलते-फिरते उत्सव में बदल देते हैं।
3. 40 वर्षों की निरंतर साधना: अनुशासन और सेवा के सच्चे प्रहरी
भक्ति की यह लौ कितनी प्रज्वलित है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जगदीश पराडकर और प्रमोद टेटे जी के नेतृत्व में 50 से अधिक श्रद्धालुओं का जत्था पिछले 40 वर्षों से बिना किसी बाधा के लगातार निशान लेकर खंडवा पहुंच रहा है। भक्तों की स्मृतियों में आज भी 1958 का वह ऐतिहासिक और विहंगम दृश्य तरोताजा है, जब पहली बार सजे-धजे हाथी पर निशान रखकर सैकड़ों श्रद्धालु खंडवा पहुंचे थे। यह जत्था आज भी अनुशासन और निस्वार्थ सेवा की सबसे बड़ी मिसाल है।
4. हर घर बना दादाजी का दरबार: उल्लास और महाआरती का अद्भुत सप्ताह
3 जुलाई को खंडवा प्रस्थान करने से पहले, यह पावन निशान पूरे एक सप्ताह तक पांढुर्णा के भक्त परिवारों के घर-घर पहुंचता है। इस दौरान पूरा नगर एक बड़े परिवार की तरह उत्सव मनाता है। घरों में निशान की विशेष पूजा, महाआरती और विशाल भंडारों का आयोजन होता है। वट पूर्णिमा के दिन जब श्री दादाजी महाराज का रथ और निशान नगर भ्रमण पर निकलता है, तो श्रद्धालु स्वयं अपने हाथों से रथ खींचकर नगरवासियों के लिए सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मांगते हैं।
5. 1936 का वह स्वर्णिम अध्याय: जब पांढुर्णा की माटी धन्य हो गई
पांढुर्णा के लोगों का दादाजी धाम से इतना गहरा और आत्मीय जुड़ाव होने का एक बहुत ही ऐतिहासिक कारण है। वर्ष 1936 में स्वयं छोटे दादाजी महाराज ने पांढुर्णा की धरा को अपने श्रीचरणों से पवित्र किया था। उस दौरान उन्होंने तीन शेर चौक स्थित दरबार में अय्याबाबा को अपना कुर्ता भेंट किया था और गुजरी चौक में धर्माधिकारी परिवार के निवास पर हवन-पूजन कर उन्हें अपनी चरण पादुका और छड़ी प्रदान की थी। ये पावन निशानियां आज भी पूरी श्रद्धा के साथ सुरक्षित हैं, जो पांढुर्णा को स्वयं में एक जाग्रत तीर्थस्थल बनाती हैं।
6. 30 हजार से अधिक भक्तों का भव्य समागम: अलौकिक दृश्य और शांति की प्रार्थना
गुरु पूर्णिमा के इस महापर्व पर पांढुर्णा, सौंसर, छिंदवाड़ा, बैतूल और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों से करीब 30 हजार से अधिक श्रद्धालु दादाजी के दर्शन हेतु खंडवा पहुंचते हैं। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर जब पांढुर्णा की निशान यात्राएं खंडवा की पार्वतीबाई धर्मशाला में प्रवेश करती हैं, तो दृश्य किसी देवलोक जैसा होता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, आसमान से होती फूलों और गुलाल की बारिश, तथा भव्य आरती के बीच जब भक्त अपने गुरु के श्रीचरणों में निशान अर्पित करते हैं, तो वहां उपस्थित हर आंख से खुशी और कृतज्ञता के आंसू छलक पड़ते हैं।
निष्कर्ष:
यह ऐतिहासिक निशान यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, भाईचारे और सकारात्मकता का वह प्रकाश स्तंभ है, जो हमें जोड़कर रखता है। “भजलो दादाजी का नाम” का यह मंत्र आज भी पांढुर्णा के रग-रग में बसता है, जो हर वर्ष नई ऊर्जा और असीम शांति के साथ विश्व कल्याण की कामना करता है।

