July 27, 2026 6:07 pm

दर्द, छाले और एक अटूट आस: अपनों की खातिर नंगे पांव गुरु के दर पर रोएगा पांढुर्णा का दिल, ‘लौटा दो हमारी दादा धाम एक्सप्रेस’

पांढुर्ना वॉच कभी-कभी सत्ता के वादों और फाइलों के शोर में आम आदमी की सिसकियां दब जाती हैं। छह साल हो गए… हमारे पांढुर्णा के कितने ही बुजुर्गों की आंखें खंडवा धाम के दर्शन को तरस गईं। इटारसी स्टेशन की भीड़ में भटक जाने का डर, ट्रेन बदलने की जद्दोजहद और पैसों की तंगी ने न जाने कितने गरीब भक्तों से उनके दादाजी महाराज को छीन लिया है। जब नेताओं के संकल्प पत्र महज कागज के टुकड़े साबित हुए और प्रशासन ने आंखें फेर लीं, तब पांढुर्णा के भक्तों ने तय किया कि अब यह गुहार सिर्फ उसी दरबार में लगेगी, जहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

​पांढुर्णा से खंडवा धाम तक की यह 360 किलोमीटर की यात्रा महज एक धार्मिक रस्म नहीं है। यह उन बुजुर्ग माताओं के आंसुओं की पुकार है, जो ट्रेन बंद होने के कारण गुरु के दर्शन नहीं कर पा रहीं। यह उन 19 निस्वार्थ भक्तों की तपस्या है, जो ‘अपनों’ की इस पीड़ा को अपने कंधों पर उठाकर, पैरों में छाले लिए, नंगे पांव दादाजी के दरबार में एक मार्मिक अर्जी लेकर पहुंचे हैं।

​खबर के मर्म को छूते मुख्य बिंदु:

किसके लिए कर रहे हैं यह तपस्या?

यह पदयात्रा मनोज गुडधे और उनके साथ चल रहे भक्तों की कोई निजी मांग नहीं है। ये उन हजारों असहाय, बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए चल रहे हैं, जिनके लिए ‘दादा धाम एक्सप्रेस’ केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि उनके गुरु तक पहुंचने का इकलौता सुरक्षित सहारा थी। यह जत्था अपने लिए कुछ नहीं मांग रहा, यह उस गरीब के लिए मांग रहा है जो इटारसी में ट्रेन बदलने के डर से पिछले छह सालों से घर में बैठकर सिर्फ दादाजी की तस्वीर निहार कर रो रहा है।

कितना कुछ सह रहे हैं ये भक्त: छालों से रिसता खून, पर जुबां पर सिर्फ गुरु का नाम

नंगे पैर डामर की तपती सड़क, मूसलाधार बारिश और फिर प्रसिद्ध काली घोड़ी मंदिर के पास का वह पथरीला, जर्जर रास्ता… इन भक्तों के पैरों के छालों से खून रिस रहा है, लेकिन कदम एक पल को भी नहीं रुके। दिनभर का चलना, रात को खुद भोजन बनाना और फिर थकान को भुलाकर पंगत लगाना। जब शरीर दर्द से टूटता है, तब “भजलो दादाजी का नाम, भजलो हरिहर जी का नाम” का जयघोष उनकी नसों में फिर से प्राण फूंक देता है। यह कोई साधारण इंसानी ताकत नहीं है, यह उस आस्था का जुनून है जो अपने लोगों की तकलीफ दूर करने के लिए कुछ भी सहने को तैयार है।

क्यों कर रहे हैं? 15 साल पहले की ‘कृतज्ञता’ अब ‘रुदन’ में बदल गई

इस यात्रा का सबसे मार्मिक पहलू इसका इतिहास है। 2011 में जब ट्रेन शुरू हुई थी, तब इसी पांढुर्णा के बेटे मनोज गुडधे ने खुशी-खुशी 360 किलोमीटर नंगे पांव चलकर दादाजी को ‘धन्यवाद’ कहा था। 15 साल बाद, आज हालात ने उसी भक्त को फिर उसी रास्ते पर नंगे पांव ला खड़ा किया है। लेकिन इस बार आंखों में खुशी नहीं, बल्कि एक रुदन है, एक याचना है— “हे दादाजी, जो सौगात आपने दी थी, वह दुनिया वालों ने छीन ली, अब आप ही हमारी दादा धाम एक्सप्रेस वापस दिलाओ।”

पांढुर्णा की माटी का दादाजी से वह खून का रिश्ता

हम पांढुर्णा वासी दादाजी से इतना गहरा जुड़ाव क्यों महसूस करते हैं? क्योंकि यह हमारा पारिवारिक रिश्ता है। इतिहास गवाह है कि जब छोटे हरीहर भोले भगवान दादाजी नागपुर से एक अहम न्यायालयीन जीत के बाद लौट रहे थे, तब उन्होंने हमारी पांढुर्णा की धरती को अपने चरणों से पवित्र किया था। स्वर्गीय धोडीराज धर्माधिकारी के निवास पर हुआ वह हवन-पूजन आज भी हमारी रगों में दौड़ता है। इसीलिए, जब पांढुर्णा को तकलीफ होती है, तो वह किसी और के दर पर नहीं, सीधे अपने दादाजी की गोद में जाता है।

28 जुलाई: जब गुरु चरणों में छलकेंगे हजारों आंसू

खंडवा पहुंच चुके पांढुर्णा के ये 19 लाड़ले भक्त 28 जुलाई, गुरु पूर्णिमा के दिन विशाल निशान यात्रा निकालेंगे। जब पांढुर्णा की सुनील बैंड पार्टी की धुनें खंडवा की सड़कों पर गूंजेंगी और गुलाल उड़ेगा, तो वह दृश्य देखने लायक होगा।

एक सामूहिक प्रार्थना: जब श्री केशवानंद, श्री धुनिवाले श्री दादाजी एवं श्री हरीहर भोले भगवान के चरणों में पांढुर्णा का यह निशान अर्पित होगा, तो वहां सिर्फ फूल और नारियल नहीं होंगे। वहां होंगे पांढुर्णा के हजारों लोगों के आंसू, पैरों के छाले और एक चीखती हुई अर्जी— “सरकारें हार गईं, नेता भूल गए… अब सिर्फ आप ही सहारा हो दादाजी, हमारे बुजुर्गों की दादा धाम एक्सप्रेस हमें लौटा दो।”