पहला अध्याय: हंसी का श्रीगणेश) एक ‘उर्फ’ जिसने सबको रुलाया

पांढुरना में एक बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित ‘मिठाई वितरण केंद्र’ हुआ करता था, जिसके पास ज़मीन थी। विकास की ट्रेन (कलेक्टर कार्यालय) जब इस स्टेशन पर रुकने वाली थी, तभी झाड़ियों से अचानक एक हास्य-सेना प्रकट हुई। ये थे ‘विवाद पहलवान’ और उनके चेले ‘टायर-पंक्चर ताऊ’।
इन दोनों का सारा जीवन बस एक शब्द पर टिका था: ‘उर्फ़’!
दरअसल, संस्था का नाम सरकारी कागज़ों में दर्ज था: ‘रसमलाई ट्रस्ट उर्फ गुलाबजामुन संस्था’।
विवाद पहलवान ने तुरंत अपनी मज़बूत ‘सरकारी कागज़ की गदा’ उठाई और चिल्लाना शुरू कर दिया: “ठहरो! इस ‘उर्फ़’ के साथ ही अन्याय हुआ है!”
(पांढुरना वाले लोटपोट) इसे ऐसे समझिए, जैसे कोई आपके घर के पते में ‘गली नंबर 5’ के बजाय ‘गली नंबर 5 उर्फ गली नंबर साढ़े-चार’ लिख दे, और आप उस आधे नंबर पर जीवन भर लड़ते रहें!
दूसरा अध्याय: पहलवान की ‘उर्फ़’ पर पीएचडी— विरोधियों की हास्यास्पद कला

विवाद पहलवान का सारा तर्क बस इतना था: “या तो ‘रसमलाई’ हो या ‘गुलाबजामुन’! यह ‘उर्फ़’ क्यों? यह विकास नहीं, यह तो कागज़ों पर किया गया ‘खाने का घोटाला’ है!”
जब कोई नहीं माना, तो पहलवान ने दाँव बदला।
विवाद पहलवान (मुंह बनाते हुए): “ठीक है! ‘उर्फ़’ पर विवाद नहीं, तो निर्माण की दूरी का है! यह कलेक्टर ऑफिस इतना दूर बन रहा है कि हमें पैदल जाना पड़ेगा! क्या प्रशासन हमें उड़ने वाले जूते देगा? विकास तो तब हो जब कलेक्टर ऑफ़िस हमारे घर के सोफे पर बने!“
(व्यंग्यात्मक घोषणा): पांढुरना वालों, ध्यान दें! यह ‘उर्फ़’ और ‘उड़ने वाले जूते’ का सारा विवाद केवल हास्य के लिए है! इसका असली कलेक्टर कार्यालय या ज़मीन विवाद से एक पैसे का भी लेना-देना नहीं है। यह तो बस ‘विवाद पहलवान’ और उनके ‘उर्फ़’ प्रेम का प्रदर्शन है!
(तीसरा अध्याय: दंगल का क्लाइमेक्स) — ‘उर्फ़’ वालों की हार, विकास की जीत!

लेकिन दंगल का सबसे मज़ेदार हिस्सा तब आया जब खुद ‘रसमलाई ट्रस्ट उर्फ गुलाबजामुन संस्था’ (हाँ, वही ‘उर्फ़’ वाली संस्था!) के मुख्य प्रतिनिधि मैदान में कूद पड़े।
मास्टरस्ट्रोक (सबसे तीखा व्यंग्य): सिर्फ़ 8 दिन पहले, इस संस्था के प्रमुखों ने, जिनमें कथित ‘उर्फ़’ प्रेम करने वाले भी शामिल थे, सर्वसम्मति से एक ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा: “हमें अब ‘उर्फ़’ की चिंता नहीं है। हमने यह ज़मीन खुशी-खुशी दान कर दी है! कलेक्टर साहब! आप जल्दी काम शुरू कीजिए!”
असर क्या हुआ?
- जिस शब्द (‘उर्फ़’) पर विवाद पहलवान पूरी ज़िन्दगी लड़ रहे थे, उसी को संस्था ने खुद ही विकास के लिए त्याग दिया!
- यह ऐसा था, जैसे पहलवान जिस पेड़ को पकड़कर झूल रहा था, उसी पेड़ को संस्था ने जड़ से काट दिया! ‘विवाद पहलवान’ और उनका चेला ‘टायर-पंक्चर ताऊ’ धड़ाम से ज़मीन पर गिरे और गुस्से से लाल हो गए।
- अब विरोध करना मतलब क्या? अब विरोध करना मतलब उस संस्था की बुद्धिमत्ता को चुनौती देना जिसने ‘उर्फ़’ का त्याग किया!
(अंतिम व्यंग्य और निष्कर्ष) — अब चुपचाप बैठिए!

अब देखिए, विवाद पहलवान और उनके चेले का हाल! उनके सारे तर्क फ़ेल हो गए। उनके पास एक ही काम बचा है: चुपचाप बैठकर अपनी ‘सरकारी कागज़ की गदा’ को सहलाना!
यह अब साफ हो गया है: विरोधी लगातार अपने तर्क बदलते रहे हैं— पहले दूरी, फिर ‘उर्फ़’, कल शायद कहेंगे कि ‘ईंटों का रंग क्यों लाल है?’
(मनोवैज्ञानिक प्रहार): पांढुरना वालों! अब अगर कोई इस निर्माण का विरोध करता है, तो उसे गंभीरता से मत लेना! हँसकर कहना: “अरे! क्या आप अब ‘उर्फ़’ के बाद ‘इतिश्री’ पर झगड़ा करेंगे? क्या आप चाहते हैं कि पांढुरना के विकास पर हमेशा के लिए ताला लग जाए?”
विकास की ट्रेन चल चुकी है। ‘उर्फ़’ का खेल खत्म हो चुका है। अब इसे रोकना मतलब पांढुरना की जनता का मज़ाक उड़ाना होगा!

