July 5, 2026 12:53 am

गाँव में ‘विकास’ की जगह ‘विनाश’ का उत्सव, सेनापति बने ‘सरकारी कुर्सी’ के खंभे

हवेली की ‘अजीबोगरीब’ सनक: कुर्सी हिली तो विकास रुका!

​ हमारे गाँव की विकास परियोजनाओं पर एक बार फिर ताला जड़ दिया गया है, लेकिन इस बार बहाना इतना हास्यास्पद है कि बुद्धिमान लोग सर पकड़कर हंस रहे हैं। पता चला है कि ‘हवेली’ की एक कुर्सी का ‘संतुलन’ बिगड़ने के कारण पूरे गाँव के विकास का संतुलन बिगड़ गया है।

​’हवेली’ से आने वाले अदृश्य सत्ताधारी के दो वफादार ‘सेनापति’—‘आदेशपाल उदय’ (जिसे केवल ‘मना’ करना आता है) और ‘प्रभुत्व प्रिय प्रताप’ (जिसे ‘मना’ करने के नए तरीके इजाद करना आता है)—आजकल गाँव की भलाई के लिए नहीं, बल्कि हवेली की फर्नीचर व्यवस्था को सही रखने के लिए काम कर रहे हैं।

​ भव्य कार्यालय पर ‘साइज़ ज़ीरो’ का हमला

​गाँव में बनने वाले बहुउद्देशीय सामुदायिक कार्यालय को पहले ही ‘ग्लास हाउस’ के कारण रोका जा चुका था। अब, जब नया, साधारण डिज़ाइन पास किया गया, तो फिर से रुकावट आ गई।

हवेली से आदेश जारी होने अनुसार, कार्यालय का कोई भी दरवाज़ा या खिड़की उस टेबल से चौड़ा नहीं होना चाहिए जो ‘हवेली’ के बैठक खाने में रखी है।

सेनापति उदय का फरमान: “अगर कल को ‘हवेली’ की कोई पुरानी, बड़ी टेबल या कुर्सी हमें नए कार्यालय में भेजनी पड़ी, और वह दरवाज़े से बाहर नहीं निकल पाई तो यह ‘हवेली’ का अपमान होगा! इसलिए, दफ़्तर का मुख्य दरवाज़ा, हवेली की सबसे चौड़ी मेज (जो 50 साल पुरानी है) से एक इंच कम होना चाहिए! गाँव की सुविधा बाद में, हवेली के फर्नीचर का परिवहन पहले।”

 

​इस ‘फर्नीचर-फर्स्ट’ नीति के कारण, अब इंजीनियरों को दरवाज़े को इतना छोटा बनाना पड़ रहा है कि उसमें से शायद केवल एक दुबला-पतला आदमी ही तिरछा होकर निकल पाए।

​सड़क निर्माण: गड्ढों को ‘राष्ट्रीय विरासत’ घोषित करने की साजिश

​गाँव की जर्जर मुख्य सड़क, जिस पर गड्ढे अब ‘पक्के’ हो चुके हैं और जो ‘वॉटर पार्क’ का अनुभव देती है, उसके निर्माण को लेकर एक नया ‘सरकारी सर्कस’ शुरू हुआ है।

​ठेकेदार ने जैसे ही डामर बिछाने का काम शुरू करने की कोशिश की, सेनापति प्रताप तुरंत मौके पर पहुंचे और काम रुकवा दिया।

हवेली से आदेश जारी होने अनुसार, सड़क पर मौजूद सबसे बड़ा और ऐतिहासिक गड्ढा किसी भी कीमत पर भरा नहीं जाएगा।

सेनापति प्रताप का तर्क: “ये गड्ढे सिर्फ गड्ढे नहीं हैं, बल्कि ये गाँव की ‘साहस-परंपरा’ के प्रतीक हैं। इसी गड्ढे में गिरकर पिछली बार हवेली की कार का टायर पंक्चर हुआ था, और उसी टायर को देखकर हवेली को गुस्सा आया था! यह गड्ढा अमर है, यह गवाह है कि हम कितनी ‘धैर्यवान’ प्रजा हैं! इसे एक छोटा ‘ऐतिहासिक जलाशय’ घोषित किया जाएगा। ठेकेदार को आदेश है कि वह इसके चारों ओर डामर बिछाए, लेकिन गड्ढे को फूलों से सजाकर संरक्षित करे।”

 

​दोनों सेनापति अब गाँव की भलाई नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने मालिक की मनमानी के लिए रबर स्टैंप और कुर्सी के कवर बन चुके हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गाँव में कोई भी काम ‘हवेली’ की सनक के विपरीत न हो जाए, भले ही इसका मतलब गाँव को जानबूझकर पीछे की ओर धकेलना हो।

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