April 10, 2026 5:23 pm

निजी स्वार्थ की नींव पर किसानों का बलिदान क्यों? कलेक्टर कार्यालय के लिए मंडी विस्थापन का प्रस्ताव तार्किक और कानूनी रूप से अस्वीकार्य

पांढुर्णा: पांढुर्णा में कृषि उपज मंडी के प्रस्तावित विस्थापन का मुद्दा अब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित, व्यापारिक व्यावहारिकता और प्रशासनिक औचित्य की कसौटी पर परखा जा रहा है। यह विस्थापन, जिसे कुछ निजी स्वार्थ साधने वाले तत्वों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, न केवल किसानों के लिए आपदा है, बल्कि यह फैसला कानूनी और तार्किक आधार पर भी अत्यंत कमज़ोर है।

​ 1: किसानों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न

​कृषि मंडी, एक आवश्यक व्यापारिक केंद्र होने के नाते, किसानों को त्वरित खरीददार और उचित प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करती है। मंडी का विस्थापन (विशेषकर  असुविधाजनक स्थान पर) किसानों को ‘व्यापार शून्य क्षेत्र’ में धकेल देगा। यह एक तथ्य है कि वर्तमान में किसानों को पहले ही कृषि उपज के उचित दाम न मिलने और कर्ज़ के कारण गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसके चलते दुर्भाग्यवश आत्महत्याएँ भी होती हैं। किसी भी सरकारी या प्रशासनिक निर्णय का प्राथमिक उद्देश्य जनहित (यहाँ किसानों का आर्थिक हित) होना चाहिए। मंडी विस्थापन सीधे तौर पर किसानों की आजीविका और आर्थिक सुरक्षा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करेगा।

​ 2: अव्यवहारिकता और सुविधाओं का अभाव

​मंडी के लिए एक सुस्थापित भौगोलिक केंद्र आवश्यक है, जहाँ परिवहन, जलपान, और विश्राम की मूलभूत सुविधाएँ हों। प्रस्तावित जगह टौवा कलां में किसानों के लिए पानी, शौचालय, खान-पान और वर्षा/धूप से बचाव की कोई बुनियादी सुविधा नहीं है। किसान घंटों तक असुविधा में रहने पर मजबूर होंगे। किसी भी नई मंडी को स्थापित करने से पहले, वहाँ ‘एपीएमसी अधिनियम’ (APMC Act) के तहत आवश्यक बुनियादी ढाँचा और सुविधाएँ उपलब्ध कराना अनिवार्य है। वर्तमान मंडी स्थल दशकों से यह सुविधा दे रहा है, जबकि नए स्थल पर यह संभव नहीं है। प्रशासनिक सुविधा के लिए किसानों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित करना तार्किक रूप से गलत है।

​ 3: प्राथमिकता का स्पष्ट निर्धारण

​कलेक्टर कार्यालय एक प्रशासनिक केंद्र है, जबकि कृषि मंडी अर्थव्यवस्था का केंद्र है। दोनों की आवश्यकता को समझते हुए प्राथमिकता का निर्धारण करना आवश्यक है। कृषि उपज मंडी वह केंद्र है जहाँ किसानों का रोज़ाना आना-जाना होता है, और यह उनकी रोजी-रोटी का मूल आधार है। इसका विस्थापन सीधे तौर पर आजीविका का नुकसान और व्यापारिक विघटन पैदा करेगा। वहीं दूसरी ओर, कलेक्टर कार्यालय एक ऐसी जगह है जहाँ आम जनता का कभी-कभार या ज़रूरत पड़ने पर ही आना होता है। कलेक्टर कार्यालय के लिए शहर के बाहर किसी भी सुलभ स्थान का चयन किया जा सकता है, जिससे किसानों का रोज़ का काम बाधित न हो। परंतु मंडी का विस्थापन सीधे तौर पर हजारों किसानों के जीवन को संकट में डालेगा। इस तरह का निर्णय न्यायसंगत नहीं है।

​ मंडी में कलेक्टर कार्यालय की माँग करने वालों के लिए मार्मिक अपील

​उन सभी व्यक्तियों और समूहों को, जो कलेक्टर कार्यालय के लिए कृषि उपज मंडी की वर्तमान भूमि की माँग कर रहे हैं, हम तर्क और मानवीयता की कसौटी पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं:

​आपकी यह माँग केवल प्रशासनिक सुविधा या निजी भू-संपत्ति के लाभ को हजारों किसानों की अपरिहार्य दैनिक आवश्यकता से ऊपर रखती है। कानूनी रूप से, किसी भी लोक-कल्याणकारी राज्य में, सबसे कमज़ोर वर्ग का आर्थिक हित सर्वोपरि होता है। मंडी का विस्थापन किसानों को उनकी ‘जीवनरेखा’ से दूर कर रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से अपार कष्ट झेलना पड़ेगा। यह माँग किसानों के लिए अनुचित है क्योंकि यह उन्हें उनकी मूलभूत सुविधाओं और व्यापारिक पहुँच से वंचित कर देती है, जबकि कलेक्टर कार्यालय को कहीं और स्थापित करने से किसी की आजीविका पर संकट नहीं आएगा। अपनी माँग पर पुनर्विचार करें और इस सच्चाई को स्वीकार करें कि आपका स्वार्थ, अन्नदाता के अस्तित्व के अधिकार को नहीं छीन सकता। आपकी सुविधा किसानों के बलिदान पर आधारित नहीं होनी चाहिए।

​ निष्कर्ष: स्वार्थ प्रेरित प्रस्ताव को रोका जाए

​यह स्पष्ट हो चुका है कि कुछ निजी हितों से प्रेरित तत्व शहर की महत्वपूर्ण व्यावसायिक भूमि को अपने फायदे के लिए बदलना चाहते हैं। प्रशासन को इन स्वार्थी माँगों को दरकिनार कर पांढुर्णा के किसानों के सामूहिक और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्रस्तावित मंडी विस्थापन को तुरंत निरस्त किया जाए और कलेक्टर कार्यालय के लिए किसी वैकल्पिक, व्यावहारिक तथा किसानों के हितों को चोट न पहुँचाने वाले स्थान का चयन किया जाए।

पांढुर्णा के सभी किसान और नागरिक अब एक होकर इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव के विरुद्ध अपनी तार्किक और कानूनी आवाज़ बुलंद करें!