पांढुर्ना|: 17वीं शताब्दी का महाराष्ट्र, भक्ति के ज्वार और सामाजिक उथल-पुथल के बीच एक ऐसे असाधारण संत का साक्षी बना, जिनका जीवन कर्मयोग, ज्ञान-संरक्षण और तेली (साहू वैश्य) समाज के आत्मगौरव का जीवंत प्रतीक है। हम बात कर रहे हैं संत शिरोमणि संताजी जगनाडे महाराज की।
उनका योगदान किसी तलवार से लड़ा गया युद्ध नहीं, बल्कि कलम और स्मृति से जीता गया एक ऐतिहासिक ज्ञान-युद्ध था—एक ऐसी गाथा जिसने न केवल एक समाज को गौरव दिलाया, बल्कि महाराष्ट्र के सबसे बड़े आध्यात्मिक खजाने को विलुप्त होने से भी बचाया।
1. लौकिक कौशल की अलौकिक परिणति

संताजी जगनाडे महाराज (जन्म 1624, सुदुंबरे) पारंपरिक रूप से तेल निकालने और व्यापार करने वाले तेली समुदाय से थे। इस समुदाय के कारण उन्हें बचपन में व्यापारिक साक्षरता मिली—सुंदर लिखावट और हिसाब-किताब का कौशल। कोई नहीं जानता था कि यही व्यावसायिक साक्षरता एक दिन भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का सबसे बड़ा हथियार बन जाएगी।
अपने गुरु, जगद्गुरू संत तुकाराम महाराज, के सान्निध्य में संताजी ने भक्ति मार्ग चुना। जब संताजी ने वैराग्य लेने का निर्णय किया, तो गुरु तुकाराम ने उन्हें रोककर ‘कर्मयोग’ का उपदेश दिया: संसार में रहकर भी परमार्थ साधा जा सकता है। गुरु के इस आदेश को शिरोधार्य कर, संताजी अपने पारंपरिक व्यवसाय को करते रहे, जबकि उनकी आत्मा निरंतर विठ्ठल भक्ति में लीन रही।
2. जलमग्न गाथा का पुनर्जन्म: ज्ञान का ‘द गार्डियन’

संताजी महाराज की कहानी में सबसे रोमांचक मोड़ तब आया जब महाराष्ट्र के ज्ञान पर सबसे बड़ा संकट छा गया।
रूढ़िवादी तत्वों ने संत तुकाराम महाराज के सामाजिक समता के संदेश से विद्वेष रखकर, उनके अभंगों की मूल पांडुलिपियों को आलंदी के पास इंद्रायणी नदी में डुबोकर नष्ट कर दिया। यह महाराष्ट्र की वैचारिक रीढ़ को तोड़ने का घिनौना प्रयास था!
लेकिन यहीं पर, तेली समुदाय के गृहस्थ भक्त, संताजी जगनाडे, एक ‘गाथा रक्षक’ के रूप में सामने आए। उनकी अविश्वसनीय तीव्र स्मरण शक्ति (कंठस्थ अभंग) और सुंदर लेखन कला ही ज्ञान को बचाने का एकमात्र आसरा थी। संताजी ने 13 दिनों तक उपवास रखा और अथक श्रम से, तुकाराम महाराज के लगभग 5000 जलमग्न अभंगों को अपनी स्मृति और कलम के बल पर फिर से लिख डाला।
आज भी यह लोक उक्ति उनके गौरव को अमर करती है: “होता संताजींचा माथा, म्हणून वाचली तुकाराम गाथा” (संताजी का मस्तिष्क/उपस्थिति थी, इसीलिए तुकाराम गाथा बच गई)।
यह कार्य तेली समाज को केवल श्रमशील ही नहीं, बल्कि ज्ञान परंपरा का सर्वोच्च संरक्षक और बौद्धिक विरासत का रक्षक स्थापित करता है।
3. ‘एका तेलीया कारणे’ – सर्वोच्च गौरव का दिव्य शिलालेख

संताजी के जीवन की पराकाष्ठा उनके निधन (1688) के समय हुई। जब उन्हें सुदुंबरे में समाधि दी जा रही थी, तो लोगों द्वारा मिट्टी डालने पर भी उनका मस्तक ढक नहीं पाया।
तभी भोर के समय, एक प्रकाश किरण चमका और स्वयं वैकुंठवासी जगद्गुरू संत तुकाराम महाराज प्रकट हुए!
तुकाराम महाराज ने अपने हाथों से संताजी के शरीर पर तीन मुट्ठी मिट्टी डाली और उनका मस्तक ढक गया। जाते समय उन्होंने जो उद्घोष किया, वह तेली समाज के इतिहास में आत्म-सम्मान का सबसे बड़ा प्रमाण बन गया:
“आम्हा येणे झाले, एका तेलीया कारणे॥” (मुझे वैकुंठ से मृत्युलोक में यहाँ आना पड़ा, केवल एक तेली के लिए।)
सोचिए! गुरु तुकाराम का वैकुंठ से लौटना और यह स्पष्ट घोषणा करना कि यह आगमन ‘केवल एक तेली’ के लिए हुआ है, जातिगत हीनता के सभी बंधनों को तोड़ता है। यह प्रमाणित करता है कि संताजी की भक्ति और कर्मनिष्ठा इतनी श्रेष्ठ थी कि उन्हें स्वयं संतों के राजा द्वारा दिव्य मान्यता प्राप्त हुई।
4. घाणा दर्शन: श्रम ही परमार्थ का द्वार

संताजी महाराज ने स्वयं भी ‘घाणे के अभंग’ की रचना की। उन्होंने अपने पारंपरिक व्यवसाय—तेल घाणा (कोल्हू)—को आध्यात्मिक साधना के रूपक में बदल दिया।
उन्होंने कहा: “आमुचा तो घाणा त्रिगुण तिळाचा” (हमारा घाणा इस संसार के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) रूपी तिल से ज्ञान रूपी तेल निकालता है)।
यह दर्शन सिखाता है कि शारीरिक श्रम (व्यवसाय) और आध्यात्मिक चिंतन (भक्ति) अलग नहीं हैं। संताजी ने सिद्ध किया कि ईमानदारी से किया गया हर काम, चाहे वह तेल निकालना ही क्यों न हो, मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बन सकता है।
5. आधुनिक तेली समाज का उत्थान
आज 21वीं सदी में, संताजी महाराज तेली समाज के लिए केवल संत नहीं हैं, बल्कि वे पहचान, एकता, और प्रगति के केंद्रीय प्रतीक हैं। उनके ‘कर्मयोग’ का आदर्श आज समाज के शैक्षिक और आर्थिक उत्थान की नींव बन गया है:
- शैक्षणिक गौरव: नागपुर स्थित शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्था (ITI) का नामकरण श्री संत जगनाडे महाराज के नाम पर किया गया है, जो उन्हें शिक्षा और व्यावसायिक कौशल के संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
- राष्ट्रीय मान्यता: भारत सरकार ने 9 फरवरी 2009 को उनके सम्मान में डाक टिकट जारी कर उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक मान्यता दी।
संताजी महाराज का जीवन तेली समाज को प्रेरित करता है कि वे केवल पारंपरिक व्यवसाय तक सीमित न रहें, बल्कि शिक्षा, कौशल विकास और बौद्धिक शक्ति के बल पर सामाजिक और आर्थिक उत्थान करें।
जय संताजी! यह उद्घोष केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि आत्मगौरव और कर्मनिष्ठा के साथ आगे बढ़ने का संकल्प है।


