सोचिए, आखिर क्यों नहीं हो रही गीता क्लीनिक पर कार्रवाई? 100 बिस्तरों का ‘भव्य सपना’, ए-4 साइज एक्स-रे की ‘हकीकत’ और बीएमओ साहब के ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ का रहस्य!

 जहां ‘सपनों’ की इमारतें बुलंद हैं और ‘कानून’ वेंटिलेटर पर है

किसी भी जिले या तहसील के स्वास्थ्य की धुरी वहां का सरकारी अस्पताल और उसके मुख्य अधिकारी होते हैं। इन दिनों पांढुर्णा का स्वास्थ्य विभाग विरोधाभासों का एक ऐसा ‘जीवंत मंच’ बन गया है, जो किसी भी आम नागरिक को गहरे सोच में डाल सकता है। एक ओर जहां नई दिल्ली से आई ‘ऑक्टेवो सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड’ की टीम मंडी परिसर में 100 बिस्तरों वाले ‘अत्याधुनिक’ जिला अस्पताल का भव्य सपना बुन रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि मरीजों को एक्स-रे की रिपोर्ट एक साधारण ‘ए-4 (A4) साइज’ के कागज पर थमाई जा रही है।

​लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी पहलू ग्राम सिवनी में चल रहा ‘गीता क्लीनिक’ है। लगातार पुख्ता साक्ष्य (इलाज करते हुए वीडियो और अमान्य डिग्रियां) सामने आने के बावजूद संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास पर आज तक कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई है। जन-चर्चाओं और हालिया घटनाक्रमों ने अब इस पूरी ‘प्रशासनिक खामोशी’ को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। आइए, अत्यंत विनम्रता के साथ उन 8 विस्तृत बिंदुओं पर विचार करते हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग (बीएमओ कार्यालय) के हाथ किस ‘अदृश्य शक्ति’ ने बांध रखे हैं:

1. 100 बिस्तरों का ‘सपना’ बनाम वर्तमान की ‘कागजी हकीकत’

स्वास्थ्य विभाग ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ ऐलान किया है कि मंडी परिसर में 100 बिस्तरों वाला नया भवन बनेगा, जिसमें अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर होगा। यह कल्पना निस्संदेह बहुत ही सुखद है। लेकिन जिस अस्पताल में आज मरीजों को एक ‘एक्स-रे फिल्म’ तक नसीब नहीं हो रही और सोनोग्राफी मशीन केवल ‘शुक्रवार’ का दिन देखकर चलती है, वह प्रबंधन भविष्य में ‘अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर’ कैसे चलाएगा? क्या सिर्फ ईंट और सीमेंट की दीवारें खड़ी कर देने से स्वास्थ्य सेवाएं सुधर जाती हैं, या इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है?

2. ‘दिव्यांग मेडिकल कैंप’ की दुर्दशा और एसडीएम का ‘पंचनामा’

पांढुर्णा सिविल अस्पताल की प्रशासनिक ‘दक्षता’ का सबसे ताजा उदाहरण हाल ही में आयोजित ‘जिला दिव्यांग मेडिकल बोर्ड कैंप’ में दिखा। दूर-दराज से आए लाचार दिव्यांगजन घंटों तक डॉक्टरों का इंतजार करते रहे, लेकिन छिंदवाड़ा से विशेषज्ञ डॉक्टर पहुंचे ही नहीं। स्थिति इतनी बेकाबू हो गई कि अंततः एसडीएम अल्का इक्का को स्वयं आकर जायजा लेना पड़ा और डॉक्टरों की अनुपस्थिति का ‘पंचनामा’ बनाकर कलेक्टर को सौंपना पड़ा। जो सिस्टम समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग के प्रति इतना ‘सहनशील’ है, उससे आम आदमी कैसी तत्परता की उम्मीद रखे?

3. सरकारी बदहाली और झोलाछापों की ‘मौज’

जब सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर कैंप में नहीं आएंगे, एक्स-रे कागज पर मिलेंगे और सोनोग्राफी के लिए शुक्रवार का इंतजार करना पड़ेगा, तो मजबूर होकर ग्रामीण मरीज कहां जाएंगे? स्वाभाविक है कि वे ‘गीता क्लीनिक’ जैसे अपंजीकृत ठिकानों की शरण लेंगे। क्या स्वास्थ्य विभाग की यह लचर कार्यप्रणाली अनजाने में ऐसे झोलाछाप क्लीनिकों का ‘व्यापार’ बढ़ाने में मददगार साबित नहीं हो रही है?

4. बीएमओ साहब का सिवनी में ‘रात्रिकालीन भ्रमण’: एक रहस्य

जन-चर्चाओं के अनुसार, दो-तीन दिन पूर्व पांढुर्णा के सम्मानित खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) साहब देर रात सिवनी ग्राम में ‘गीता क्लीनिक’ की ओर गए थे। हम उनकी कर्तव्यनिष्ठा पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं, हो सकता है वे किसी ‘गुप्त निरीक्षण’ पर गए हों। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ के बाद भी गीता क्लीनिक सील नहीं हुआ और न ही कोई आधिकारिक कार्रवाई सामने आई। तो फिर इस भ्रमण का उद्देश्य क्या था?

5. ‘अद्भुत संयोग’: अधिकारी के लौटते ही बोर्ड पर फिर गया ‘पेंट’!

बीएमओ साहब के इस ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ के अगले ही दिन एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। गीता क्लीनिक के बाहर लगे जिस बोर्ड पर शान से I.B.A.M. और B.I.A.M.S. जैसी भ्रामक डिग्रियां और ‘जनरल इलाज’ का दावा लिखा था, उस बोर्ड को हटाकर उस पर ‘पेंट’ पोत दिया गया! क्या यह महज एक संयोग है कि स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख के वहां जाने के तुरंत बाद, सबूत मिटाने के लिए बोर्ड पर पेंट कर दिया गया? जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं यह ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ कार्रवाई करने के लिए था, या फिर कार्रवाई से ‘बचाने की सलाह’ देने के लिए?

6. कानून का ‘मखमली’ इस्तेमाल और सुप्रीम कोर्ट का उपहास

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ (1996) के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली (MBBS) का ज्ञान न होने पर भी उसका अभ्यास करने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से ‘क्वाक’ (झोलाछाप) है । ‘नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) एक्ट 2019’ की धारा 34 और 54  तथा ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’  के तहत बिना पंजीकरण इलाज करने पर जेल और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है। जब कानून इतने सख्त हैं, तो फिर पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग डॉ. बिस्वास पर इन कानूनों का इस्तेमाल इतनी ‘मखमली और सहमी हुई’ नजाकत के साथ क्यों कर रहा है?

7. क्या पूरी व्यवस्था का ‘रिमोट कंट्रोल’ किसी और के हाथ में है?

जब एसडीएम एक कैंप में डॉक्टरों के न आने पर तुरंत पंचनामा बना सकती हैं, तो बीएमओ कार्यालय 40 सालों से चल रहे एक अवैध क्लीनिक और 25 अप्रैल के इलाज करते हुए ‘पुख्ता डिजिटल वीडियो’ का पंचनामा बनाकर उसे सील क्यों नहीं कर पा रहा है? क्या बीएमओ साहब वास्तव में लाचार हैं, या इस क्लीनिक पर किसी बड़े ‘रसूखदार’ या ‘नेताजी’ का ऐसा मखमली संरक्षण है, जिसके आगे स्वास्थ्य विभाग ने भी विनम्रतापूर्वक अपने हथियार डाल दिए हैं?

8. क्या टूट जाएगा व्यवस्था से जनता का भरोसा?

एक प्रशासन की असली ताकत उसकी इमारतें नहीं, बल्कि जनता का उस पर ‘भरोसा’ होता है। यदि पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग इसी तरह खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ने देगा; यदि रात्रिकालीन मुलाकातों के बाद सुबूतों (बोर्ड) पर पेंट पोतने का खेल चलता रहेगा, तो कल को आम आदमी का इस सिस्टम से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा। और यदि भविष्य में किसी गलत इलाज से कोई जनहानि होती है, तो इसकी नैतिक और वैधानिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर उन अधिकारियों की होगी, जिन्होंने समय रहते कार्रवाई करने के बजाय ‘मौन’ साधे रखा। सोचिए, आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

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