
जहां ‘सपनों’ की इमारतें बुलंद हैं और गरीब की ‘जान’ वेंटिलेटर पर है
किसी भी सभ्य समाज में स्वास्थ्य विभाग का मुख्य दायित्व जनता के जीवन की रक्षा करना होता है। लेकिन पांढुर्णा जिले का स्वास्थ्य तंत्र इन दिनों विरोधाभासों का एक ऐसा ‘जीवंत मंच’ बन गया है, जो किसी भी आम नागरिक को गहरे सोच में डाल सकता है। एक ओर जहां 100 बिस्तरों वाले ‘अत्याधुनिक’ जिला अस्पताल का भव्य सपना बुना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्राम सिवनी में ‘गीता क्लीनिक’ के नाम से सरेआम चल रहे एक अवैध क्लीनिक के सामने पूरा सिस्टम श्रद्धापूर्वक हाथ बांधे खड़ा है।
लगातार पुख्ता डिजिटल साक्ष्य (इलाज करते हुए जिओ-टैग वीडियो) सामने आने के बावजूद संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास पर आज तक कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई है। इसी ‘प्रशासनिक खामोशी’ का ताजा शिकार बनी हैं सिवनी की एक बेहद गरीब और विधवा महिला— कुसुम उकार। मजदूरी करके पेट पालने वाली इस बेबस महिला को डॉ. बिस्वास के एक गलत इंजेक्शन ने ऐसा दर्द दिया कि उसे सुधारने में 80 हजार रुपये स्वाहा हो गए! आइए, अत्यंत विनम्रता के साथ उन 8 विस्तृत बिंदुओं पर विचार करते हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग (बीएमओ कार्यालय) के हाथ किस ‘अदृश्य शक्ति’ ने बांध रखे हैं:
1. कुसुम उकार की मार्मिक व्यथा: कमर में लगा ‘चमत्कारी’ इंजेक्शन और 80 हजार का कर्ज
सिवनी की गरीब और विधवा महिला कुसुम उकार, जो इस ढलती उम्र में भी मेहनत-मजदूरी कर अपना भरण-पोषण करती हैं, डॉ. बिस्वास के ‘गीता क्लीनिक’ की नियमित मरीज (परमानेंट कस्टमर) थीं। वे उन्हें अपना मसीहा मानती थीं। हाल ही में डॉक्टर साहब ने उनकी कमर में एक इंजेक्शन लगाया। कुछ ही दिनों में उस जगह एक भयंकर गठान (Lump) बन गई और पक गई। जब दर्द से तड़पती कुसुम जी वापस उसी ‘भगवान’ के पास गईं, तो उन्होंने बड़ी ही बेरहमी से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “यह मेरी वजह से नहीं हुआ है।” दर्द से कराहती इस बेबस महिला को अंततः पांढुर्णा और फिर नागपुर के एक सर्जन के पास जाकर अपनी जान बचानी पड़ी, जिसमें उनके जीवन भर की गाढ़ी कमाई और कर्ज के 70 से 80 हजार रुपये खर्च हो गए। क्या प्रशासन की नजर में एक गरीब विधवा की जान और आंसुओं की कोई कीमत नहीं है?
2. कानून का ‘मखमली’ इस्तेमाल: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की खुली अवहेलना
कानून की नजर में कुसुम जी की कमर में बनी जानलेवा गठान और उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी का लुट जाना कोई छोटी बात नहीं है। ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 116 के तहत किसी भी अंग को स्थायी या गंभीर नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ (Grievous Hurt) की श्रेणी में आता है। वहीं, BNS की धारा 125 के तहत बिना योग्यता के ऐसा लापरवाही भरा कृत्य कर दूसरों की जान खतरे में डालना 3 साल तक की जेल वाला संज्ञेय अपराध है। जब कानून इतने सख्त हैं, तो प्रशासन इनका इस्तेमाल इतनी ‘सहमी हुई नजाकत’ के साथ क्यों कर रहा है?
3. 40 साल का ‘अनुभव’ या कानून की नजर में 40 साल का ‘उल्लंघन’?
अक्सर अज्ञानतावश यह तर्क दिया जाता है कि डॉक्टर साहब 40 वर्षों से गांव की सेवा कर रहे हैं। लेकिन कानून भावनाओं से नहीं चलता। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 के ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ के ऐतिहासिक फैसले में बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली (MBBS) का ज्ञान न होने के बावजूद उसका अभ्यास करने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से ‘क्वाक’ (झोलाछाप) है । बिना वैध मान्यता के 40 साल तक इलाज करना ‘सेवा’ नहीं, बल्कि कानून का 40 साल लंबा उल्लंघन है। साथ ही ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 के तहत बिना वैध डिग्री इलाज करना 5 लाख रुपये जुर्माने और 1 साल की जेल वाला अपराध है ।
4. बीएमओ साहब की ‘अद्भुत कार्यनिष्ठा’ और ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ का रहस्य
जन-चर्चाओं के अनुसार, कुछ दिन पूर्व पांढुर्णा के सम्मानित खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) साहब देर रात सिवनी ग्राम में ‘गीता क्लीनिक’ की ओर गए थे। हम उनकी इस ‘रात्रिकालीन कार्यनिष्ठा’ पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं। हो सकता है वे किसी ‘गुप्त निरीक्षण’ पर गए हों। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस ‘गुप्त भ्रमण’ के बाद भी गीता क्लीनिक सील नहीं हुआ। तो फिर इस भ्रमण का असली उद्देश्य क्या था? क्या यह एक आधिकारिक दौरा था या फिर कुछ और?
5. ‘अद्भुत संयोग’: अधिकारी के लौटते ही बोर्ड पर फिर गया ‘पेंट’!
बीएमओ साहब के इस ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ के अगले ही दिन एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। गीता क्लीनिक के बाहर लगे जिस बोर्ड पर शान से I.B.A.M. और B.I.A.M.S. जैसी अमान्य डिग्रियां और ‘जनरल इलाज’ का दावा लिखा था, उस बोर्ड को हटाकर रातों-रात उस पर ‘पेंट’ पोत दिया गया! भारतीय न्याय संहिता की धारा 238 के तहत अपराध के साक्ष्यों को मिटाना एक गंभीर अपराध है। क्या यह महज एक संयोग है कि स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख के वहां जाने के तुरंत बाद, सबूत मिटाने के लिए इतनी फुर्ती दिखाई गई? जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं यह ‘रात्रिकालीन भ्रमण’ कार्रवाई करने के लिए था, या फिर कार्रवाई से ‘बचने की युक्ति’ देने के लिए? भारतीय न्याय संहिता की धारा 252 स्पष्ट कहती है कि यदि कोई लोक सेवक (Public Servant) किसी व्यक्ति को सजा से बचाने के इरादे से कानून की दिशा की अवहेलना करता है, तो वह भी दंड का भागीदार है।
6. 25 अप्रैल का पुख्ता ‘डिजिटल वीडियो’ और विभाग का ‘असीम धैर्य’
अक्सर अधिकारी यह तर्क देते हैं कि “हमें मौके पर कोई साक्ष्य नहीं मिला।” लेकिन 25 अप्रैल 2026 के जिओ-टैग (GPS) वीडियो में डॉ. बिस्वास साक्षात एक बुजुर्ग मरीज का ‘इलाज’ करते और पर्चा लिखते दिख रहे हैं, जो अब पूरे क्षेत्र में वायरल है। जब एसडीएम एक कैंप में डॉक्टरों के न आने पर तुरंत पंचनामा बना सकती हैं, तो बीएमओ कार्यालय इन 100% अभेद्य डिजिटल साक्ष्यों का पंचनामा बनाकर क्लीनिक को सील क्यों नहीं कर पा रहा है? क्या विभाग का यह ‘असीम धैर्य’ उनकी लाचारी है, या किसी ‘अदृश्य’ रसूखदार की मेहरबानी?
7. 100 बिस्तरों का ‘भव्य सपना’ बनाम ए-4 (A4) साइज एक्स-रे की ‘कागजी हकीकत’
एक तरफ प्रशासन मंडी परिसर में 100 बिस्तरों वाले नए अस्पताल का सपना दिखा रहा है, वहीं सिविल अस्पताल की हकीकत यह है कि मरीजों को एक्स-रे की रिपोर्ट ‘ए-4 साइज’ के कागज पर थमाई जा रही है और सोनोग्राफी सिर्फ ‘शुक्रवार’ को होती है। जब सरकारी अस्पताल की यह दुर्दशा होगी, तो कुसुम उकार जैसे मजबूर ग्रामीण ऐसे ही झोलाछापों की शरण में जाएंगे। क्या स्वास्थ्य विभाग जानबूझकर अपनी व्यवस्थाएं लचर रख रहा है ताकि ऐसे अपंजीकृत क्लीनिकों का ‘व्यापार’ फलता-फूलता रहे?
8. पीड़ित को मुआवजा और जनता के लिए चेतावनी
अगर ‘सिस्टम’ की लापरवाही और एक झोलाछाप के दुस्साहस से एक गरीब विधवा के 80 हजार रुपये बर्बाद हुए हैं, तो ‘मध्य प्रदेश अपराध पीड़ित प्रतिकर योजना, 2015’ के तहत उसे सरकार से वैधानिक मुआवजा मिलना चाहिए। सिवनी की जनता को अब यह समझना होगा कि क्या वे सिर्फ ‘भविष्य के सपनों’ पर तालियां बजाना चाहते हैं, या फिर 40 साल से चल रहे इस ‘अवैध तिलिस्म’ को तोड़कर अपने लिए एक बेहतर और सुरक्षित सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की मांग करना चाहते हैं?
निष्कर्ष:
यदि पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग इसी तरह खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ने देगा; यदि रात्रिकालीन मुलाकातों के बाद सुबूतों (बोर्ड) पर पेंट पोतने का खेल चलता रहेगा, तो कल को आम आदमी का इस सिस्टम से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा। ‘पांढुर्णा वॉच’ किसी का व्यक्तिगत विरोधी नहीं है, लेकिन जनता की जान से हो रहे इस खिलवाड़ पर हमारी पारदर्शी मुहीम तब तक नहीं रुकेगी, जब तक प्रशासन अपनी कुर्सियों से उठकर कानून का राज स्थापित नहीं करता। सोचिए, आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

