
प्रस्तावना: एक कागजी ‘सुपर-स्पेशलिटी’ अस्पताल और जमीनी ‘क्वाकरी’ (झोलाछाप) के बीच पिसती मासूम जनता
किसी भी जिले के प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का सबसे पहला धर्म होता है अपनी जनता के जीवन की रक्षा करना। लेकिन पांढुर्णा का स्वास्थ्य महकमा इन दिनों विरोधाभासों और रहस्यों का एक ऐसा ‘जीवंत मंच’ बन चुका है, जो किसी भी सभ्य समाज को विचलित कर सकता है। एक ओर 100 बिस्तरों वाले ‘अत्याधुनिक’ जिला अस्पताल का भव्य सपना बुना जा रहा है, और दूसरी ओर ग्राम सिवनी में ‘गीता क्लीनिक’ के नाम से सरेआम चल रहे एक अवैध क्लीनिक के सामने पूरा सिस्टम नतमस्तक नजर आ रहा है।
लगातार पुख्ता साक्ष्य सामने आने के बावजूद संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास पर आज तक कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई है। क्या स्वास्थ्य विभाग की इस गहरी ‘चुप्पी’ और हाल ही में अधिकारियों के ‘रात्रिकालीन दौरों’ के पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है? आइए, अत्यंत विनम्रता के साथ उन 8 विस्तृत और ज्वलंत कड़ियों पर विचार करते हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर पांढुर्णा प्रशासन के हाथ किस ‘अदृश्य शक्ति’ ने बांध रखे हैं:
1. 100 बिस्तरों के ‘स्वप्नलोक’ में ए-4 (A4) साइज एक्स-रे का ‘कटु सत्य’: क्या यही है स्वास्थ्य सेवाओं का आधुनिकीकरण?
स्वास्थ्य विभाग ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ ऐलान किया है कि मंडी परिसर में 100 बिस्तरों वाला नया भवन बनेगा। यह कल्पना बहुत ही सुखद है। लेकिन जिस सिविल अस्पताल में आज मरीजों को ‘एक्स-रे फिल्म’ तक नसीब नहीं हो रही और रिपोर्ट एक साधारण ए-4 (A4) कागज पर थमाई जा रही है; जहां सोनोग्राफी मशीन केवल ‘शुक्रवार’ का दिन देखकर चलती है, वह प्रबंधन भविष्य में अत्याधुनिक अस्पताल कैसे चलाएगा? क्या सिर्फ ईंट और सीमेंट की दीवारें खड़ी कर देने से स्वास्थ्य सेवाएं सुधर जाती हैं, या इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है? जब सरकारी अस्पताल की यह दुर्दशा होगी, तो ग्रामीण मरीज मजबूर होकर ‘गीता क्लीनिक’ जैसे ठिकानों पर ही जाएंगे।
2. कुसुम उकार का दर्द और 80 हजार की चपत: क्या अपंजीकृत ‘मसीहाओं’ के इलाज की यही है अंतिम वैधानिक परिणति?
सिवनी की एक गरीब और विधवा महिला कुसुम उकार, जो मजदूरी कर अपना पेट पालती हैं, इसी ‘प्रशासनिक खामोशी’ का सबसे दर्दनाक शिकार बनी हैं। डॉ. बिस्वास द्वारा कमर में लगाए गए एक इंजेक्शन ने उनकी दुनिया उजाड़ दी। इंजेक्शन से बनी भयंकर गठान जब पक गई, तो कथित डॉक्टर ने “यह मेरी वजह से नहीं हुआ” कहकर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। तड़पती कुसुम जी को अंततः नागपुर जाकर अपनी जान बचानी पड़ी, जिसमें उनके जीवन भर की गाढ़ी कमाई के 80 हजार रुपये स्वाहा हो गए। क्या प्रशासन की नजर में एक गरीब विधवा के आंसुओं की कोई कीमत नहीं है?
3. 25 अप्रैल का पुख्ता ‘इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य’: क्या प्रशासन की दृष्टि में यह डिजिटल प्रमाण ‘अदृश्य’ हो चुका है?
अक्सर अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि “हमें मौके पर कुछ नहीं मिला।” लेकिन 25 अप्रैल 2026 के जिओ-टैग (GPS) वीडियो में डॉ. बिस्वास साक्षात एक बुजुर्ग मरीज का इलाज करते नजर आ रहे हैं। क्या इतने पारदर्शी और डिजिटल ‘इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस’ के बाद भी विभाग को किसी ‘विशेष आमंत्रण’ की प्रतीक्षा है?
4. बीएमओ साहब का ‘रात्रिकालीन विश्राम-हीन’ दौरा और सुबह ‘पेंट’ होता बोर्ड: क्या इस ‘अद्भुत संयोग’ की कोई प्रशासनिक व्याख्या है?
जन-चर्चाओं के अनुसार, हाल ही में पांढुर्णा के सम्मानित खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) साहब देर रात सिवनी ग्राम में ‘गीता क्लीनिक’ की ओर गए थे। हैरतअंगेज संयोग देखिए कि इस ‘गुप्त भ्रमण’ के ठीक अगले दिन क्लीनिक के बाहर लगे बोर्ड (जिस पर I.B.A.M. जैसी अमान्य डिग्रियां लिखी थीं) को रातों-रात ‘पेंट’ पोतकर मिटा दिया गया! क्या यह महज एक संयोग है कि स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख के वहां जाने के तुरंत बाद, सबूत मिटाने के लिए इतनी फुर्ती दिखाई गई? जनता यह पूछ रही है कि क्या यह दौरा ‘कार्रवाई’ करने के लिए था, या फिर ‘साक्ष्य मिटाने की सलाह’ देने के लिए?
5. साक्ष्य मिटाने का दुस्साहस और ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS): क्या लोक सेवकों की ‘मौन स्वीकृति’ भी जांच के दायरे में आएगी?
कानून की नजर में साक्ष्य मिटाना कोई साधारण बात नहीं है। ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 238 के तहत अपराध के साक्ष्यों को मिटाना एक दंडनीय अपराध है। साथ ही, BNS की धारा 252 स्पष्ट कहती है कि यदि कोई लोक सेवक (Public Servant) किसी व्यक्ति को सजा से बचाने के इरादे से कानून की दिशा की अवहेलना करता है, तो वह भी दंड का भागीदार है। क्या प्रशासन इस ‘पेंट पोतने’ वाले प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगा?
6. माननीय सर्वोच्च न्यायालय और NMC एक्ट की अनदेखी: क्या पांढुर्णा में ‘क्वाकरी’ को मिला हुआ है कोई विशेष वैधानिक विशेषाधिकार?
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ (1996) मामले में बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली का ज्ञान न होने के बावजूद उसका अभ्यास करने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से ‘क्वाक’ (झोलाछाप) है। ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 के तहत बिना वैध डिग्री इलाज करना 5 लाख रुपये जुर्माने और 1 साल की जेल वाला अपराध है। वहीं, कुसुम जी को गलत इंजेक्शन लगाकर स्थायी नुकसान पहुंचाना BNS की धारा 116 (घोर उपहति) और 125 (दूसरों की जान खतरे में डालना) के तहत एक संगीन जुर्म है। जब कानून इतने सख्त हैं, तो प्रशासन इनका इस्तेमाल इतनी ‘सहमी हुई नजाकत’ के साथ क्यों कर रहा है?
7. ‘अदृश्य’ राजनीतिक संरक्षण की जन-चर्चाएं: क्या जन-प्रतिनिधियों के लिए ‘जनस्वास्थ्य’ से अधिक ‘जनमत’ (वोट बैंक) महत्वपूर्ण है?
जब स्वास्थ्य विभाग स्वयं किसी को अपनी ‘झोलाछाप सूची’ में डालता है और फिर भी कार्रवाई नहीं करता, तो यह स्पष्ट संकेत है कि इस क्लीनिक के ऊपर किसी बड़े ‘नेताजी’ या रसूखदार का अदृश्य छाता तना हुआ है। क्या चंद राजनीतिक लाभ के लिए एक ऐसी व्यवस्था को फलने-फूलने देना उचित है? एक सच्चा जननेता वह है जो कानून का साथ दे, न कि मौत के सौदागरों का। क्या हमारे जन-प्रतिनिधि इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे?
8. जवाबदेही का यक्ष प्रश्न: यदि व्यवस्था ही मौन साधेगी, तो ग्रामीण जनता न्याय और इलाज के लिए किस द्वार पर जाएगी?
यदि इसी तरह रात्रिकालीन मुलाकातों के बाद सुबूतों पर पेंट पोतने का खेल चलता रहा; यदि कुसुम जैसी गरीब महिलाओं की 80 हजार की पूंजी लुटती रही और सरकारी अस्पताल एक्स-रे के लिए ए-4 कागज बांटता रहा, तो कल को आम आदमी का इस लोकतांत्रिक सिस्टम से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा। ‘पांढुर्णा वॉच’ का यह शंखनाद तब तक नहीं रुकेगा, जब तक प्रशासन अपनी कुर्सियों से उठकर कानून का राज स्थापित नहीं करता और ‘गीता क्लीनिक’ पर वैधानिक ताला नहीं लग जाता। सोचिए… और अपने प्रशासन से जवाब मांगिए!
जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory Disclaimer):
यह समाचार पूर्णतः प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों, पीड़ित मरीजों के बयानों, स्थानीय जन-चर्चाओं और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (BNS, NMC Act) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था की मानहानि करना नहीं है, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के मूल अधिकार की रक्षा हेतु प्रशासन की जवाबदेही तय करना और आम जनता को जागरूक करना है। खबर में उठाए गए प्रश्न जनहित में पूछे गए हैं।

