
जब ‘चौथे स्तंभ’ की चोट से जागी प्रशासनिक चेतना
लोकतंत्र में जब व्यवस्थाएं मौन ओढ़ लेती हैं और आम जनता की जान सस्ती हो जाती है, तब एक निडर और बेखौफ पत्रकारिता ही सिस्टम को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाती है। पांढुर्णा के ग्राम सिवनी में संचालित ‘गीता क्लीनिक’ और उसके ‘कथित’ डॉक्टर आर. एन. बिस्वास के अवैधानिक तिलिस्म को लेकर ‘पांढुर्णा वॉच’ ने जो मुहिम छेड़ी थी, आज उस पर खुद स्वास्थ्य विभाग ने अपनी आधिकारिक मुहर लगा दी है। लगातार परोसे गए पुख्ता डिजिटल साक्ष्यों, 25 अप्रैल के वीडियो और कुसुम उकार जैसी गरीब विधवा की दर्दनाक दास्तां का ही यह असर था कि अंततः पांढुर्णा के सम्मानित खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. दीपेंद्र सलामे को मौके पर जाकर जांच करनी पड़ी।
इस जांच में जो हकीकत सामने आई है, वह न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि यह भी साबित करती है कि इतने सालों से बिना किसी खौफ के ग्रामीण जनता के स्वास्थ्य के साथ कैसा ‘खूनी खेल’ चल रहा था। आइए, अत्यंत सौम्य भाषा और 7 विस्तृत वैधानिक बिंदुओं के माध्यम से समझते हैं कि इस जांच में क्या खुलासे हुए हैं और अब इस मामले की तार्किक एवं कानूनी परिणति क्या होनी चाहिए:
1. ‘पांढुर्णा वॉच’ की मुहिम की ऐतिहासिक जीत और प्रशासन का सराहनीय कदम
लगातार उठ रहे सवालों और डिजिटल साक्ष्यों के बाद पांढुर्णा स्वास्थ्य विभाग (BMO) द्वारा गीता क्लीनिक पर की गई यह कार्रवाई निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है। जब प्रशासन जनहित में इस तरह की तत्परता दिखाता है, तो आम जनता का लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर विश्वास सुदृढ़ होता है। ‘पांढुर्णा वॉच’ इस मुस्तैदी के लिए स्वास्थ्य विभाग की सराहना करता है। यह हमारी पत्रकारिता की एक बड़ी जीत है कि आज वह सच सरकारी ‘पंचनामे’ में दर्ज हो गया है, जिसे हम लगातार जनता के सामने ला रहे थे।
2. बीएमओ के समक्ष ‘कथित मसीहा’ का आधिकारिक कुबूलनामा: “कोई लाइसेंस नहीं है”
जांच के दौरान सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ तब आया, जब बीएमओ साहब के स्पष्ट सवालों के आगे डॉ. बिस्वास का आत्मविश्वास जवाब दे गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब उनसे एलोपैथी प्रैक्टिस का ‘लाइसेंस’ मांगा गया, तो उन्होंने साफ कुबूल किया कि उनके पास कोई लाइसेंस नहीं है और वे मात्र एक ‘आधार कार्ड’ के भरोसे 35 सालों से मरीजों की जान से खेल रहे हैं! बिना मरीजों के रजिस्टर के (Patient Register) और बिना लाइसेंस के 35 साल तक प्रैक्टिस करना, हमारी व्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर चिंतन का विषय है।
3. 10वीं पास (थर्ड डिवीजन) और ‘कोलकाता’ की अमान्य डिग्रियों का मायाजाल
डॉक्टर साहब की जिस ‘डिग्री’ का इतना भौकाल था, उसकी हकीकत किसी भी पढ़े-लिखे इंसान को चौंका देगी। दस्तावेजों के अनुसार, ये महोदय 1980 में पश्चिम बंगाल बोर्ड से मात्र 10वीं कक्षा (थर्ड डिवीजन) पास हैं। इनके पास ‘इंडियन बोर्ड ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन्स’ (IBAM), कोलकाता का एक प्रमाणपत्र है। जनता और प्रशासन को यह जानना चाहिए कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने आधिकारिक तौर पर इस संस्थान (IBAM) को एक ‘फर्जी’ (Fake) विश्वविद्यालय घोषित किया हुआ है। क्या एक 10वीं पास व्यक्ति द्वारा फर्जी डिग्रियों के सहारे ‘सभी प्रकार का जनरल इलाज’ करना, कानून की नजर में सीधे तौर पर एक आपराधिक कृत्य नहीं है?
4. ‘दवाइयां’ गायब, लेकिन सिरींज और ‘पर्ची’ (Prescription Pad) ने खोली पोल
यह सच है कि बीएमओ की टीम को मौके पर शायद कोई बड़ी मात्रा में दवाइयां नहीं मिलीं । लेकिन पंचनामे में ‘सिरींज’ (Syringe), मेडिकल उपकरण और दवाइयां लिखने वाली ‘पर्ची’ (Prescription Pad) का मिलना ही इस बात का 100% वैधानिक प्रमाण है कि वहां अवैध रूप से इंजेक्शन लगाए जाते थे और दवाइयां लिखी जाती थीं। डॉक्टर ने स्वयं स्वीकार किया है कि वह इन्ही पर्चियों पर दवाइयां लिखता है।
5. माननीय सर्वोच्च न्यायालय और NMC एक्ट की कसौटी पर यह कृत्य
भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ (1996) के ऐतिहासिक फैसले में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो व्यक्ति बिना उचित मान्यता प्राप्त डिग्री (MBBS) के चिकित्सा करता है, वह ‘क्वाक’ (झोलाछाप) और ढोंगी है । ‘नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) एक्ट, 2019’ की धारा 34 के तहत, बिना वैध पंजीकरण के मेडिकल प्रैक्टिस करना या पर्चे पर दवा लिखना 5 लाख रुपये जुर्माने और 1 साल तक की जेल वाला संज्ञेय अपराध है । अब जब सब कुछ पंचनामे में दर्ज है, तो क्या प्रशासन इन सख्त कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई करेगा?
6. क्या कुसुम उकार के दर्द और 80 हजार की बर्बादी का होगा न्याय?
यह कार्रवाई केवल एक ‘रूटीन चेकअप’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी ‘गीता क्लीनिक’ के इलाज और कथित तौर पर गलत इंजेक्शन के कारण एक मरीज की उंगली कटने की नौबत आ गई थी और एक बेबस विधवा महिला, कुसुम उकार के जीवन भर की गाढ़ी कमाई के 80 हजार रुपये गठान सुधरवाने में बर्बाद हो गए थे। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 116 और 125 के तहत बिना योग्यता के ऐसा इलाज कर किसी को स्थायी नुकसान (घोर उपहति) पहुंचाना एक गंभीर अपराध है। क्या इन गरीब मरीजों को अब न्याय मिलेगा?
7. आगे की राह: अब FIR और ‘क्लीनिक सील’ होने का है इंतजार
बीएमओ डॉ. दीपेंद्र सलामे जी ने पंचनामा बनाकर अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी का पहला और अहम चरण पूरा कर लिया है, जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। लेकिन यह अंतिम परिणति नहीं है। अब ‘पांढुर्णा वॉच’ और आम जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस पंचनामे के आधार पर ‘मध्य प्रदेश नर्सिंग होम एक्ट’ के तहत इस क्लीनिक को विधिवत रूप से सील किया जाएगा? क्या पुलिस थाने में BNS और NMC एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत धोखाधड़ी की नामजद FIR दर्ज करवाई जाएगी? प्रशासन को अपनी इस बेहतरीन शुरुआत को अंजाम तक पहुंचाना ही होगा, ताकि कोई भी रसूखदार बीच में आकर इस वैधानिक प्रक्रिया को बाधित न कर सके।
जनहित में वैधानिक उद्घोषणा :
यह समाचार ‘पांढुर्णा वॉच’ की जमीनी पड़ताल, स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में की गई जांच (पंचनामे के तथ्यों), पीड़ित मरीजों के बयानों और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (BNS, NMC Act) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इसका उद्देश्य किसी का व्यक्तिगत अपमान करना नहीं, बल्कि आम जनता को जागरूक करना और प्रशासन के सराहनीय कदमों का समर्थन करते हुए कानून का राज स्थापित करने में सहयोग करना है।

