महा-पड़ताल: 10वीं पास ‘मसीहा’, गायब दवाइयां और ग्रामीणों का ‘सेल्फ-गोल’ वाला वीडियो! जानिए ‘गीता क्लीनिक’ के तिलिस्म से लेकर बीएमओ साहब की ‘सराहनीय’ कार्रवाई का पूरा सच

विस्तृत प्रस्तावना: 15 दिनों की मुहिम, एक ‘रहस्यमयी’ जांच और सिस्टम का ‘मौन’ समर्पण

कहते हैं चिकित्सा एक नोबल पेशा है, जहां डॉक्टर भगवान का रूप होता है। लेकिन पांढुर्णा के ग्राम सिवनी में संचालित ‘गीता क्लीनिक’ की कहानी इस पवित्र पेशे को ही आईना दिखा रही है। पिछले 15 दिनों से ‘पांढुर्णा वॉच’ लगातार साक्ष्यों के साथ यह उजागर कर रहा था कि कैसे यहां बिना किसी वैध मेडिकल डिग्री के ‘जनरल इलाज’ की दुकान सजी है।

​मीडिया के भारी दबाव के बाद, अंततः पांढुर्णा के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. दीपेंद्र सलामे जी ने अपने वातानुकूलित कक्ष से बाहर निकलकर मैदानी स्तर पर जांच की। हम प्रशासन और विशेषकर बीएमओ साहब की इस ‘अद्भुत कार्यनिष्ठा’ की खुले दिल से प्रशंसा करते हैं। लेकिन, जब इस जांच के पन्नों को पलटा गया और पर्दे के पीछे का खेल सामने आया, तो कई ऐसे विरोधाभास और हास्यास्पद तथ्य उजागर हुए जो सोचने पर मजबूर करते हैं। एक 10वीं पास ‘विलेन’, एक बेबस विधवा के 80 हजार रुपये की बर्बादी, और बचाव में उतरे ग्रामीणों का एक ऐसा ‘वायरल वीडियो’ जिसने खुद ही डॉक्टर के खिलाफ सबसे बड़ी गवाही दे दी! आइए, 8 विस्तृत और तार्किक बिंदुओं के माध्यम से इस पूरी ‘सरकारी पटकथा’ और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करते हैं:

1. द ग्रेट ‘डिग्री’ इल्यूजन: 10वीं पास (थर्ड डिवीजन) से ‘सुपर-स्पेशलिस्ट’ बनने का सफर

डॉ. आर. एन. बिस्वास की जिस ‘डिग्री’ का इतना भौकाल था, उसकी सच्चाई किसी भी पढ़े-लिखे इंसान को हैरत में डाल देगी। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, इन ‘मसीहा’ जी ने 1980 में पश्चिम बंगाल बोर्ड से मात्र 10वीं कक्षा (वह भी थर्ड डिवीजन) पास की है! 10वीं के बाद सीधे मेडिकल प्रैक्टिस के मैदान में उतर जाना अपने आप में एक ‘चमत्कार’ है। इनके पास ‘IBAM कोलकाता’ का एक सर्टिफिकेट है, जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने आधिकारिक तौर पर ‘फर्जी’ (Fake) संस्थान घोषित कर रखा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 के ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ मामले में स्पष्ट किया है कि बिना वैध ज्ञान के चिकित्सा करने वाला व्यक्ति ‘क्वाक’ (झोलाछाप) है । क्या एक 10वीं पास व्यक्ति द्वारा बिना विज्ञान पढ़े मरीजों की जान से खेलना सबसे बड़ा अपराध नहीं है?

2. बीएमओ साहब की ‘सराहनीय’ जांच: पर्ची और सिरींज मिली, पर दवाइयां गायब?

बीएमओ साहब की कार्रवाई का हम सम्मान करते हैं, लेकिन जांच का सबसे हास्यास्पद पहलू यह रहा कि क्लीनिक में इंजेक्शन लगाने वाली सिरींज और दवाइयां लिखने वाली पर्ची (Prescription Pad) तो मिलीं, लेकिन एलोपैथिक ‘दवाइयां’ नदारद थीं! जन-चर्चाओं के अनुसार, कार्रवाई से कुछ दिन पहले ही ‘रात्रिकालीन दौरा’ हुआ था, जिसके बाद रातों-रात बोर्ड पर पुते ‘पेंट’ ने साक्ष्य मिटाने की गवाही दी। क्या जिस व्यक्ति ने अपना बोर्ड पेंट कर दिया हो, उसने जांच से पहले दवाइयां नहीं छुपाई होंगी? भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 238 के तहत साक्ष्य मिटाना एक गंभीर अपराध है। यदि दवाइयां नहीं थीं, तो क्या 35 साल से ‘हवा’ का इंजेक्शन लगाया जा रहा था?

3. कुसुम उकार की दर्दनाक व्यथा: अगर दवा नहीं थी, तो वह ‘जहरीला’ इंजेक्शन किसका था?

दवाइयां न मिलने की थ्योरी उस वक्त तार-तार हो जाती है, जब हम सिवनी की गरीब और विधवा महिला कुसुम उकार की दर्दनाक कहानी देखते हैं। कुसुम जी का स्पष्ट आरोप है कि डॉ. बिस्वास द्वारा लगाए गए एक इंजेक्शन के कारण ही उनकी कमर में भयंकर गठान बनी, जिसे नागपुर में ठीक कराने में उनके 80 हजार रुपये बर्बाद हो गए। यदि डॉक्टर के पास दवाइयां थीं ही नहीं, तो कुसुम जी के शरीर में क्या इंजेक्ट किया गया था? भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 116 के तहत लापरवाही से स्थायी नुकसान पहुंचाना ‘घोर उपहति’ का अपराध है। क्या प्रशासन इस बेबस विधवा के आंसुओं का संज्ञान लेगा?

4. 35 साल का ‘अनुभव’ और ऑन-कैमरा कुबूलनामा: क्या अब भी सुबूत की कमी है?

कार्रवाई के दौरान सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब डॉ. बिस्वास ने मीडिया के कैमरे और अधिकारियों के सामने स्वयं कुबूल किया कि उनके पास एलोपैथी का कोई लाइसेंस नहीं है और वे 35 साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं! ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट की धारा 34 साफ कहती है कि बिना वैध पंजीकरण के चिकित्सा करना 5 लाख रुपये जुर्माने और 1 साल की जेल वाला अपराध है । जब एक कथित डॉक्टर ने स्वयं अपना वैधानिक उल्लंघन स्वीकार कर लिया है, तो फिर क्लीनिक को तुरंत सील करने के लिए किस ‘मुहूर्त’ का इंतजार किया जा रहा है?

5. ‘बूमरैंग’ दांव: बचाव में आए ग्रामीणों का वीडियो ही बन गया सबसे बड़ा ‘सरकारी गवाह’!

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी और हास्यास्पद चालाकी तब हुई, जब ग्रामीणों द्वारा एक वीडियो प्रचारित किया गया। वीडियो में ग्रामीण प्रशासन को यह ‘चेतावनी’ देते दिखे कि यदि डॉक्टर पर कार्रवाई हुई तो वे आंदोलन करेंगे। इसे अंग्रेजी में ‘बूमरैंग’ (Boomerang) कहते हैं—यानी अपना ही वार खुद पर भारी पड़ना! जिन ग्रामीणों को ढाल बनाकर प्रशासन को डराने की कोशिश की गई, उन्हीं ग्रामीणों ने वीडियो में स्पष्ट स्वीकार कर लिया कि “डॉक्टर साहब सालों से हमारा इलाज करते हैं।” जब डॉक्टर का कुबूलनामा और ग्रामीणों का यह बयान एक साथ मिलता है, तो यह 100% साबित हो जाता है कि वहां अवैध मेडिकल प्रैक्टिस चल रही थी। अब कोई इस वीडियो को झुठला नहीं सकता!

6. सरकारी अस्पताल की दुर्दशा: क्या 100 बिस्तरों का सपना ए-4 साइज एक्स-रे से पूरा होगा?

हम ग्रामीणों की बेबसी समझ सकते हैं। एक तरफ स्वास्थ्य विभाग 100 बिस्तरों वाले नए अस्पताल का सपना दिखा रहा है, वहीं हकीकत यह है कि सिविल अस्पताल में एक्स-रे की रिपोर्ट ए-4 (A4) कागज पर दी जा रही है और सोनोग्राफी सिर्फ शुक्रवार को होती है। जब सरकारी अस्पताल की यह दुर्दशा होगी और 24 घंटे डॉक्टर नहीं मिलेंगे, तभी तो ग्रामीण मजबूर होकर 10वीं पास झोलाछापों को अपना ‘भगवान’ मानेंगे।

7. ‘पंचनामे’ की प्रति छिपाने का गहरा रहस्य: क्या पारदर्शी कार्रवाई में भी ‘अदृश्य झोल’ है?

एक निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई की पहचान उसके दस्तावेजों की सार्वजनिक उपलब्धता होती है। जब बीएमओ कार्यालय से इस निरीक्षण के ‘पंचनामे’ की कॉपी मांगी गई, तो अभी तक विभाग द्वारा कोई जानकारी नहीं दी गई है। क्या पंचनामे में कोई ऐसी ‘कमजोर भाषा’ गढ़ी गई है जिसे छिपाया जा रहा है? यदि कार्रवाई पूर्णतः सत्यनिष्ठा से की गई है, तो दस्तावेज साझा करने में यह ‘असीम संकोच’ क्यों?

8. क्या टूट जाएगा व्यवस्था से जनता का भरोसा? ‘पांढुर्णा वॉच’ का अटल संकल्प!

एक 10वीं पास व्यक्ति को बचाने के लिए इतने सारे हथकंडे अपनाए जाना बेहद चिंताजनक है। ‘पांढुर्णा वॉच’ स्पष्ट करना चाहता है कि हम बीएमओ साहब की इस प्राथमिक जांच का सम्मान करते हैं, लेकिन हम इस ‘दिखावटी’ और ‘आधी-अधूरी’ कार्रवाई से रुकने वाले नहीं हैं। जब तक ‘मध्य प्रदेश नर्सिंग होम एक्ट’ के तहत इस क्लीनिक पर वैधानिक ताला (सील) नहीं लग जाता , और कुसुम जी को न्याय नहीं मिलता, हमारी यह जनहितकारी मुहीम निरंतर जारी रहेगी!

जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory/Legal Disclaimer):

यह समाचार पूर्णतः ‘पांढुर्णा वॉच’ की जमीनी पड़ताल, स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में की गई आधिकारिक जांच, ऑन-कैमरा कुबूलनामे, प्राप्त डिजिटल व वायरल वीडियो साक्ष्यों, और भारत के स्थापित वैधानिक नियमों (NMC Act, BNS, MP Clinical Establishment Act) पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी, संस्था या ग्रामीणों पर निराधार आरोप लगाना नहीं है, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के मूल अधिकार की रक्षा हेतु कार्रवाई में पारदर्शिता की मांग करना और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। खबर में उठाए गए सभी विषय ‘प्रश्नवाचक (?)’ शैली में जनहित के सवाल मात्र हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच उच्च अधिकारियों द्वारा अपेक्षित है।

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