भीषण गर्मी, सूखी गुंडियां और ‘आदरणीय’ सचिव जी का तर्क: सीताढाना की प्यास पर उठते जन-सवाल

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पांढुर्ना |जब आसमान से आग बरस रही हो और कंठ सूख रहे हों, तब जल ही जीवन का एकमात्र सहारा होता है। लेकिन ग्राम पंचायत चिचखेड़ा के सीताढाना गांव की माताओं और बहनों के लिए यह ग्रीष्मकाल किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। पिछले तीन महीनों की चिलचिलाती धूप में, जब एक-एक बूंद पानी अनमोल था, तब इस गांव की आधी बस्ती अपनी खाली गुंडियां लिए केवल प्रशासनिक आश्वासनों का घूंट पीकर प्यास बुझाती रही। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब ग्रामीण महिलाएं बूंद-बूंद को तरस रही थीं, तब पंचायत का जिम्मेदार ढांचा खामोश बैठा रहा। जन-समस्याओं के प्रति इसी प्रशासनिक संवेदनहीनता और धरातल की कड़वी सच्चाई को इन ६ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

 तीन महीने की तपती दुपहरी और अकल्पनीय संघर्ष

जरा उस पीड़ा की कल्पना कीजिए जब पारा ४५ डिग्री के पार हो, और घरों में पीने के पानी की एक बूंद न हो। पिछले ९० दिनों से सीताढाना के ग्रामीण इसी अमानवीय स्थिति से गुजर रहे हैं। आसपास कोई कुआं या जल स्रोत न होने के कारण, भीषण गर्मी में महिलाओं का पूरा दिन केवल पानी की तलाश में व्यतीत हो रहा है। चार दिन के लंबे इंतजार के बाद बमुश्किल चार-पांच गुंडी पानी मिलना, नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की अत्यंत मार्मिक और करुण विडंबना है।

 बिना तकनीकी मूल्यांकन के कनेक्शन और ठप व्यवस्था

इस भीषण जल संकट का मूल कारण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से अदूरदर्शी तकनीकी प्रबंधन है। मुख्य पाइपलाइन में उसकी जलवाहन क्षमता से कहीं अधिक नल कनेक्शन दे दिए गए। बिना किसी ठोस तकनीकी परीक्षण के किए गए इस विस्तार का परिणाम यह हुआ कि पानी का दबाव शून्य हो गया और आधी बस्ती के हलक सूखे रह गए।

९० दिनों की गुहार और जन चर्चा में तैरते गंभीर सवाल

यह बिंदु इस पूरे प्रकरण का सबसे विचारणीय और पीड़ादायक पहलू है। गांव की गलियों और चौपालों पर वर्तमान में यह विषय गहरी जन चर्चा का केंद्र बना हुआ है कि आखिर पिछले तीन महीनों से जब महिलाएं लगातार शिकायत कर रही थीं, तब ग्राम पंचायत के जिम्मेदार पद पर बैठे ‘आदरणीय विजेंद्र धुर्वे जी’ क्या कर रहे थे? भीषण गर्मी के इस पूरे मौसम में जब ग्रामीणों को तत्काल राहत की आवश्यकता थी, तब आदरणीय सचिव महोदय की प्रशासनिक प्राथमिकताएं क्या थीं? तीन महीने का यह लंबा मौन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई स्वाभाविक प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।

 ‘आदरणीय’ सचिव जी का बयान: घाव पर मरहम या नमक?

जब यह मामला तूल पकड़ने लगा, तब ग्राम पंचायत सचिव, आदरणीय विजेंद्र धुर्वे जी का जो पक्ष सामने आया, वह क्षेत्र में तीखी जन चर्चा का विषय बन गया है। आदरणीय सचिव जी का यह तर्क कि “अन्य पंचायतों की तुलना में यहां जल्दी पानी दिया जा रहा है,” ग्रामीणों को स्तब्ध करने वाला है। जनमानस में यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्यास से व्याकुल लोगों को अपनी तकनीकी विफलता का समाधान देने के बजाय, अन्य बदतर हालात वाली पंचायतों से तुलना करके स्वयं को सही ठहराना एक जिम्मेदार और संवेदनशील प्रशासनिक आचरण है?

 भटेवाड़ी में बहता जल: व्यवस्था का दोहरा मापदंड

प्रशासनिक अनदेखी का यह आलम केवल सीताढाना तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार पास के भटेवाड़ी गांव में पाइपलाइन कई जगहों से क्षतिग्रस्त है और वहां से कीमती पानी व्यर्थ बह रहा है। एक तरफ जहां ग्रामीण गर्मी में बूंद-बूंद को तरस रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लीकेज से पानी का इस तरह बहना, पंचायत के रखरखाव तंत्र की पूर्ण विफलता और विरोधाभास को उजागर करता है।

 जनपद पंचायत की चौखट और न्याय की अंतिम आस

जब तीन महीने तक ग्राम पंचायत स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तब जाकर थक-हारकर महिलाओं को अपना काम-काज छोड़कर जनपद पंचायत पहुंचना पड़ा और प्रभारी सीईओ विनयप्रकाश ठाकुर के समक्ष अपनी मार्मिक गुहार लगानी पड़ी। सीईओ महोदय द्वारा आदरणीय सचिव जी को तत्काल समाधान के निर्देश देना इस बात की पुष्टि करता है कि पंचायत स्तर पर समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया था। अब ग्रामीण इस आस में हैं कि क्या उच्चाधिकारियों के निर्देश के बाद व्यवस्था की नींद टूटेगी?

वैधानिक निवेदन (Statutory Disclaimer):

यह समाचार पूर्णतः दिनांक १२ जून २०२६ को ग्राम पंचायत चिचखेड़ा के सीताढाना व अन्य संबंधित ग्रामों की महिलाओं द्वारा जनपद पंचायत कार्यालय में सार्वजनिक रूप से की गई शिकायत, जनसामान्य के बीच चल रही चर्चाओं (जन चर्चा) और मौके की वस्तुस्थिति पर आधारित है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी भी सम्मानीय जन-प्रतिनिधि या अधिकारी (आदरणीय पंचायत सचिव अथवा अन्य) की व्यक्तिगत मानहानि करना या उनकी छवि धूमिल करना कदापि नहीं है। यह प्रकाशन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत, पूर्णतः ‘सद्भावना (Good Faith)’ और ‘व्यापक जनहित (Public Interest)’ में किया गया है, ताकि प्रशासन जल संकट जैसी मूलभूत और गंभीर समस्या का त्वरित संज्ञान लेकर ग्रामीणों को राहत प्रदान कर सके।

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