72 घंटे, 230 फीट की ऊंचाई और मौत से लुकाछिपी: टावर से उतरते ही तड़पकर बोला- “मछली-चावल खिलाओ, 150 रुपए दो, गांव जाना है”… पढ़ें ‘ऑपरेशन जिंदगी’ की पूरी अनकही कहानी!

पांढुर्ना कल्पना कीजिए… जमीन से 230 फीट ऊपर, लोहे के सर्द और तपते भीमकाय ढांचे के बीच, बिना अन्न और जल की एक बूंद के लगातार तीन दिन और तीन रातें! पांढुर्ना के तीन शेर चौक स्थित BSNL टावर पर सोमवार शाम से जो सांसें थाम देने वाला मंजर चल रहा था, उसका बुधवार शाम करीब 6:15 बजे एक ऐसा भावुक अंत हुआ, जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। मौत के मुहाने पर बैठा शख्स कोई सिरफिरा या अपराधी नहीं था, बल्कि अपनों से बिछड़ा, रास्ता भटका हुआ एक बेबस और बीमार पिता था। भोपाल और नागपुर के जांबाजों ने जब अपनी जान पर खेलकर उसे रस्सियों से बांधकर सुरक्षित जमीन पर उतारा, तो 72 घंटे से मौत से लड़ रहे उस शख्स के पहले शब्द थे- “मछली-चावल खिलाओ और 150 रुपए दे दो, मुझे गांव जाना है।” पढ़िए पांढुर्ना के इतिहास के सबसे जटिल, खतरनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाले इस अद्वितीय ‘ऑपरेशन जिंदगी’ की पूरी इनसाइड स्टोरी, जिसमें सस्पेंस है, खौफ है, प्रशासन का अदम्य साहस है और अंत में एक रुला देने वाली करुणा है:

1. पहचान की गुत्थी: सोनातून दीहार या अम्बुज दिगार?

रेस्क्यू के दौरान इस शख्स की पहचान एक पहेली बन गई थी। थाना प्रभारी अमित दानी और परिजनों की शुरुआती जानकारी में नाम ‘सोनातून दीहार’ (खड़कपुर, बलियाबारा, झाड़ग्राम) सामने आया था। लेकिन ‘पांढुर्ना वॉच’ को मिले उनके असली आधार कार्ड ने सच्चाई स्पष्ट कर दी। यह शख्स दरअसल अम्बुज दिगार (लगभग 71 वर्ष) हैं, जो पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के धड़ंगरी (अस्कोला) के मूल निवासी हैं। परिजनों के मुताबिक, वे सात दिन पहले अपनी बेटी को छोड़ने के लिए ट्रेन से नागपुर आए थे और वहीं से लापता हो गए। मानसिक रूप से अस्वस्थ होने और इलाज चलने के कारण, भटकते हुए वे पांढुर्ना पहुंच गए और खौफ के मारे इस विशालकाय टावर पर जा चढ़े।

2. 15 फीट लंबी लोहे की रॉड और खौफ का वो खौफनाक मंजर:

यह रेस्क्यू कोई आम बचाव अभियान नहीं था। एसडीओपी बृजेश भार्गव के नेतृत्व में प्रशासन ने ड्रोन कैमरे से निगरानी शुरू की। तस्वीरें रूह कंपा देने वाली थीं—वह बुजुर्ग गमछे में लिपटा, डरा हुआ और बेहद आक्रामक नजर आ रहा था। रेस्क्यू टीम के सदस्य राजाबाबू चौधरी जब अपनी जान हथेली पर रखकर बिस्किट और पानी लेकर उस तक पहुंचे, तो देखा कि अम्बुज के हाथ में करीब 15 फीट लंबी लोहे की रॉड थी। मानसिक संतुलन खो चुका वह पिता किसी को मारना नहीं चाहता था, बल्कि अपनी जान बचाने की जद्दोजहद (Survival Instinct) में, पास आने वाले हर शख्स को अपना दुश्मन समझकर रॉड से हमला करने का प्रयास कर रहा था।

3. भाषा की वो दीवार, जिसने मौत को करीब ला दिया:

इस पूरे ऑपरेशन में सबसे बड़ा रोड़ा ‘संवादहीनता’ थी। प्रशासन नीचे से हिंदी, मराठी और स्थानीय गोंडी भाषा में लाउडस्पीकर पर मिन्नतें कर रहा था, लेकिन ठेठ बंगाली परिवेश का वह बुजुर्ग एक शब्द नहीं समझ पा रहा था। अनजान शहर, अनजान लोग और अजनबी भाषाओं की आवाजों ने उसके अंदर वर्दी और लोगों का ऐसा खौफ भर दिया था कि वह नीचे उतरने को तैयार ही नहीं था।

4. प्रशासन का ‘सामरिक धैर्य’ और जांबाजों की महा-जीत:

इस महा-रेस्क्यू में पांढुर्ना पुलिस और प्रशासन की भूमिका की जितनी तारीफ की जाए, कम है। उन्होंने बल प्रयोग की जल्दबाजी नहीं की। एहतियात के तौर पर टावर के नीचे सुरक्षा जाल, मैटिंग और मोटे गद्दे बिछाए गए। जब स्थानीय प्रयास विफल होने लगे, तब भोपाल और नागपुर से ‘फायर एंड रेस्क्यू’ के 4 प्रशिक्षित विशेषज्ञों को बुलाया गया। इन विशेषज्ञों ने गजब का शौर्य दिखाया। वे बिना डरे टावर पर चढ़े, 15 फीट की रॉड के वार से खुद को बचाया और बेहद पेशेवर तरीके से अम्बुज को रस्सियों के सुरक्षा घेरे में बांधकर सावधानीपूर्वक नीचे ले आए।

5. रुला देने वाला अंत: बस 150 रुपए और घर की याद…

जैसे ही 72 घंटे की प्यास और भूख से टूट चुके अम्बुज के कदम जमीन पर पड़े, सारा खौफ और गुस्सा आंसुओं में बह गया। एक पिता जो अपनी बेटी को छोड़ने निकला था और मौत के करीब पहुंच गया था, उसकी सबसे बड़ी मांग सिर्फ इतनी थी- बंगाल का मुख्य भोजन ‘मछली-चावल’ और अपने गांव लौटने के लिए बस ‘150 रुपए का किराया’। इस एक वाक्य ने पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के तनाव को पल भर में एक गहरी करुणा में बदल दिया।

6. भविष्य के लिए सबक: अब न दोहराई जाए यह चूक!

इस सफल ‘ऑपरेशन जिंदगी’ ने प्रशासन की कार्यकुशलता का डंका तो बजा दिया, लेकिन भविष्य के लिए एक कड़ी चेतावनी भी दे दी है। शहर के बीचों-बीच इतने अहम टावर पर कोई कैसे चढ़ सकता है? भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दूरसंचार कंपनियों को सभी टावरों के बेस पर ‘एंटी-क्लाइंबिंग जाली’ (Anti-climbing mesh) और कंटीले तारों की फेंसिंग लगाना अनिवार्य करना चाहिए, ताकि पांढुर्ना को दोबारा ऐसे दहशत भरे 72 घंटों का सामना न करना पड़े।