
पांढुर्ना कल्पना कीजिए… घर के एक कोने में बैठी उस बूढ़ी मां की, जिसकी आंखों की रोशनी भले ही कम हो गई हो, लेकिन दिल में धूनीवाले श्री दादाजी महाराज के दर्शन की लौ आज भी जल रही है। कांपते हाथों में पूजा की थाली है, लेकिन पैरों में इतनी जान नहीं कि वह रात के अंधेरे में इटारसी स्टेशन पर धक्के खाकर दूसरी ट्रेन बदल सके। ऐसी ही अनगिनत पथराई आंखें पिछले छह सालों से सिर्फ एक चमत्कार का इंतजार कर रही हैं— ‘दादा धाम एक्सप्रेस’ का दोबारा शुरू होना।
आज जब आसमान से मूसलाधार बारिश हो रही है, तब पांढुर्णा की सड़कों से गुजरता मनोज गुडधे और उनके साथियों का वह जत्था दरअसल आसमान के पानी से नहीं, बल्कि उन्हीं असहाय बुजुर्गों के आंसुओं से भीग रहा है। पैरों में गहरे छाले पड़ चुके हैं, कीचड़ से रास्ते फिसलन भरे हो गए हैं, लेकिन नंगे पांव उठने वाला हर कदम किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उस बूढ़े पिता, उस लाचार मां और समाज के हर उस असहाय व्यक्ति के लिए उठ रहा है, जिनसे उनकी ‘दादा धाम एक्सप्रेस’ छीन ली गई है।
पड़ाव-दर-पड़ाव: यह सिर्फ दूरी नहीं, दर्द और उम्मीद का फासला है
यह कोई सामान्य सफर नहीं है। यह 360 किलोमीटर की वह अग्निपरीक्षा है, जहां हर किलोमीटर पर शरीर टूटता है, लेकिन आत्मा और मजबूत हो जाती है।
- मुलताई का पहला पड़ाव (38 किलोमीटर की दुर्गम शुरुआत): पांढुर्णा के शिव पंचायत श्री दादाजी दरबार से जब यह जत्था चला, तो रास्ते में बारिश ने उनका कड़ा इम्तिहान लिया। बिना किसी छाते, बिना किसी वाहन के, सिर्फ “भजलो दादाजी का नाम” का जाप करते हुए इन यात्रियों ने पहले ही दिन 38 किलोमीटर का दुर्गम सफर तय कर मां ताप्ती की नगरी मुलताई में अपना पहला पड़ाव डाला। पैरों की नसें तन चुकी थीं, लेकिन चेहरों का सुकून बता रहा था कि वे अपने लिए नहीं, अपनों के लिए चल रहे हैं।
- आमला पंखा का दूसरा पड़ाव (35 किलोमीटर का और संघर्ष): अगली सुबह, छालों से रिसते दर्द के बावजूद कदम फिर उठ खड़े हुए। मुलताई से 35 किलोमीटर का सफर तय करते हुए जब यह जत्था आमला पंखा पहुंचा, तो रास्ते में पड़ने वाले हर गांव के लोगों की आंखें इन्हें देखकर छलक उठीं। जो लोग इन यात्रियों को चाय या पानी देने आगे आ रहे थे, वे भीतर ही भीतर इस बात से शर्मिंदा भी थे कि हमारे ही हिस्से की लड़ाई लड़ने के लिए हमारे इन भाइयों को इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है।
सिस्टम से सवाल: क्या इन छालों की कीमत कोई समझ पाएगा?
जब आप अपने घर की सुरक्षित और सूखी छत के नीचे बैठकर यह खबर पढ़ रहे हैं, तब याद रखिए कि कोई अनजान रास्तों पर, सर्द हवाओं और बारिश के थपेड़ों के बीच सिर्फ इसलिए पैदल चल रहा है ताकि कल को आपके या मेरे घर का कोई बुजुर्ग आसानी से ट्रेन में बैठकर अपने गुरु के दर्शन कर सके।
वे बुजुर्ग, जिनके पास किराया तो है, पर शरीर में ट्रेनें बदलने की ताकत नहीं। वे भक्त, जो गलत ट्रेन में बैठ जाने के खौफ से अब घर से नहीं निकलते। उन सबकी मूक दुआएं इन नंगे पांव चलने वाले यात्रियों के साथ चल रही हैं। यह यात्रा केवल रेल मंत्रालय को जगाने के लिए नहीं है, यह हमारे सोए हुए समाज को झकझोरने के लिए है। यह पूछती है कि क्या एक जायज और बुनियादी सुविधा को वापस पाने के लिए हमें अपने ही लोगों को इस कदर तड़पाना होगा?
एक मार्मिक अपील: सिर्फ पढ़ें नहीं, अंतर्मन से जुड़ें
जब मनोज गुडधे और यह पूरा निशान जत्था 360 किलोमीटर दूर खंडवा धाम में धूनीवाले श्री दादाजी महाराज के चरणों में वह निशान अर्पित करेगा, तो उसमें केवल फूल और गुलाल नहीं होगा। उस निशान में गुंथे होंगे इन पदयात्रियों के पसीने, उनके पैरों के छाले और पांढुर्णा के हर उस व्यक्ति की सिसकियां, जो इस ट्रेन के बंद होने से अनाथ सा महसूस कर रहा है।
आइए, हम सब भले ही शारीरिक रूप से उनके साथ उस कीचड़ और बारिश में न चल सकें, लेकिन मानसिक, आत्मिक और वैचारिक रूप से उनके हर कदम के साथ अपना कदम मिलाएं। उनके इस दर्द को, उनकी इस तपस्या को इतना साझा करें, इतना समर्थन दें कि इन छालों की गूंज बहरी हो चुकी व्यवस्था के कानों के पर्दे फाड़ दे। क्योंकि यह यात्रा उनकी नहीं, हमारी है।

