पांढुर्ना के वार्डों में “खुलेआम” शराब की बिक्री: क्या आबकारी विभाग की अनदेखी शहर को डुबो रही है?

पांढुर्ना: एक ओर जहां आबकारी विभाग बड़े तस्करों पर नकेल कसने का दावा करता है, वहीं पांढुर्ना के हर गली-मोहल्ले और वार्डों में अवैध शराब की बिक्री का धंधा बेखौफ जारी है। यह स्थिति शहर के जागरूक नागरिकों और स्थानीय निवासियों के बीच कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है कि आखिर क्यों आंतरिक वार्डों में इस अवैध व्यापार पर लगाम नहीं लग पा रही है।

​शहर के हृदय में, विशेषकर  पांढुर्णा जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, हर नुक्कड़ पर कच्ची और अंग्रेजी शराब आसानी से उपलब्ध है। यह खुलेआम होती बिक्री न केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है, बल्कि युवा पीढ़ी को भी नशे की गर्त में धकेल रही है। स्थानीय लोगों की मानें तो, इस वजह से वार्डों में आपराधिक गतिविधियों, घरेलू हिंसा और सार्वजनिक झगड़ों में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे शांति और सुरक्षा की भावना लगातार घट रही है।

महिला सुरक्षा पर गहराता खतरा

​अवैध शराब की उपलब्धता ने वार्डों में महिलाओं की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है। शाम ढलते ही शराब के नशे में धुत व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली छेड़छाड़, अभद्र टिप्पणियां और असुरक्षित माहौल महिलाओं के लिए घर से निकलना मुश्किल कर देते हैं। कई बार तो घर के अंदर भी नशेड़ियों द्वारा उत्पन्न अशांति और घरेलू हिंसा का खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है। यह स्थिति महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और सामान्य जीवन जीने से रोक रही है, जिससे समाज में उनके योगदान पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

आबकारी विभाग की भूमिका पर सवालिया निशान

​जब शहर के सीमावर्ती और बाहरी क्षेत्रों में बड़े ऑपरेशनों की खबरें सुर्खियां बटोरती हैं, तो यह समझ से परे है कि शहर के अंदरूनी हिस्सों में, जहां यह समस्या दशकों से जड़ें जमाए हुए है, वहां प्रभावी कार्यवाही क्यों नहीं होती? क्या आबकारी विभाग की नजरें इन “छोटे” अड्डों तक नहीं पहुंच पातीं, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि स्थानीय निवासियों द्वारा बार-बार शिकायतें करने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।

​नागरिकों का कहना है कि जिस तत्परता और सख्ती से विभाग बड़े तस्करों पर कार्रवाई करता है, उसी तत्परता से वार्डों में अवैध शराब बेचने वालों पर भी निरंतर अभियान चलाया जाए। यह सिर्फ कानून का मामला नहीं, बल्कि समाज के स्वास्थ्य और भविष्य का भी है, जिसमें महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा भी शामिल है।

सामाजिक बुराई या प्रशासनिक विफलता?

​यह केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि कहीं न कहीं प्रशासनिक विफलता की ओर भी इशारा करती है। यदि आबकारी विभाग अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाए, तो क्या यह संभव है कि शहर के बीचों-बीच अवैध शराब का धंधा यूं ही फलता-फूलता रहे?

​पांढुर्ना के नागरिक अब प्रशासन से यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे इस गंभीर मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और सिर्फ दिखावटी कार्यवाही के बजाय, जमीनी स्तर पर ऐसे ठोस कदम उठाएं जिससे इस “खुलेआम” अवैध शराब की बिक्री पर स्थायी रोक लग सके और शहर को एक स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण मिल सके, जहां महिलाएं भी बिना किसी डर के जीवन जी सकें।

​क्या आबकारी विभाग इस चुनौती को स्वीकार करेगा और शहर के अंदरूनी हिस्सों में फैल रही इस बुराई को जड़ से खत्म करेगा? यह वक्त ही बताएगा।

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