पांढुर्णा का ‘खोखला’ विकास: 1.10 करोड़ की रिटर्निंग वॉल महज एक साल में धराशायी, जनता की जान से खिलवाड़ का असली गुनहगार कौन?

 

पांढुर्ना पांढुर्णा शहर के मेघनाथ वार्ड और संत रविदास वार्ड में चंद्रभागा नदी पर बनी रिटर्निंग वॉल का एक साल के भीतर ही ताश के पत्तों की तरह ढह जाना, सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है। जिस निर्माण को बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए 1 करोड़ 10 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार किया गया था, वह अपनी गुणवत्ता में स्वयं एक ‘आपदा’ साबित हुआ है। यह मामला सिर्फ एक दीवार के गिरने का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नगर पालिका प्रशासन, तकनीकी अधिकारियों और ठेकेदार की उस कथित कार्यप्रणाली को बेनकाब करता है, जिसने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए हजारों वार्डवासियों की जान को दांव पर लगा दिया। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती; धराशायी हुई यह दीवार चीख-चीख कर निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की गवाही दे रही है। आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई की इस खुली बर्बादी और विश्वासघात का जिम्मेदार कौन है?

भ्रष्टाचार की ‘दरकती’ दीवार: मामले के 6 विस्तृत और कड़वे सत्य

1. आपदा प्रबंधन के नाम पर ‘भ्रष्टाचार’ की नींव

आपदा प्रबंधन मद का मुख्य उद्देश्य जनता के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना होता है। इसी मद से लगभग 1 करोड़ 10 लाख रुपये की भारी राशि स्वीकृत की गई थी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ठेकेदार और जिम्मेदार इंजीनियरों ने इस राशि को सुरक्षा की दीवार बनाने के बजाय कथित तौर पर ‘मुनाफे की दीवार’ बनाने में खपा दिया। महज एक साल में कंक्रीट की दीवार का धराशायी होना यह साबित करता है कि निर्माण सामग्री (मटेरियल) के अनुपात और गुणवत्ता के साथ किस स्तर का शर्मनाक समझौता किया गया है।

2. ले-आउट का ‘खेल’ और तकनीकी अमले की संदिग्ध खामोशी

सूत्रों और स्थानीय प्रतिनिधियों के अनुसार, निर्माण के शुरुआती दौर में ही ठेकेदार द्वारा निर्धारित ले-आउट से छेड़छाड़ कर 2 से 3 मीटर नदी की ओर अतिक्रमण करने के गंभीर आरोप लगे थे। सवाल यह उठता है कि जब यह तकनीकी हेराफेरी हो रही थी, तब नगर पालिका के सब-इंजीनियर और तकनीकी अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी, या यह सब उनकी मौन सहमति से हो रहा था? बिना तकनीकी अमले की मिलीभगत के इतना बड़ा बदलाव जमीनी स्तर पर संभव ही नहीं है।

3. कागजों में ही दफन हो गया ‘कारण बताओ’ नोटिस

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू प्रशासनिक लीपापोती है। जब वार्ड पार्षदों की शिकायत पर पालिका अध्यक्ष श्री संदीप घाटोड़े और परिषद सदस्यों ने मौके का निरीक्षण किया, निर्माण में भारी खामियां पाई गईं और काम रुकवा दिया गया। ठेकेदार और इंजीनियर के बीच तीखी बहस भी हुई। सीएमओ को सूक्ष्म जांच कर ठेकेदार को नोटिस जारी करने के सख्त निर्देश दिए गए थे। लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी न कोई नोटिस जारी हुआ और न ही कोई जांच रिपोर्ट सामने आई। उल्टे, ठेकेदार ने बेखौफ होकर काम दोबारा शुरू कर दिया। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक अक्षमता या फिर किसी गहरे ‘गठजोड़’ की ओर इशारा करता है।

4. राजनीतिक रसूख और मीडिया की चेतावनियों की घोर अनदेखी

यह मुद्दा नया नहीं है। पूर्व में भी मीडिया और जागरूक नागरिकों ने इस रिटर्निंग वॉल की घटिया गुणवत्ता को लेकर प्रशासन को बार-बार चेताया था। इसके बावजूद किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई (जैसे ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करना या पेनाल्टी लगाना) का न होना यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर इस ठेकेदार के सिर पर किस ‘सफेदपोश’ का हाथ है? क्या पांढुर्णा नगर पालिका में राजनीतिक रसूख के आगे नियम और कानून बौने हो चुके हैं?

5. मानसून की आहट: हजारों जिंदगियों के साथ सीधा और संगीन खिलवाड़

दीवार गिरने से अब मेघनाथ वार्ड और संत रविदास वार्ड के नागरिकों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। आगामी मानसून में यदि चंद्रभागा नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो बाढ़ का पानी सीधे लोगों के घरों में घुसेगा। प्रशासन की इस आपराधिक लापरवाही का खामियाजा क्या अब मासूम जनता अपनी जान और माल गंवाकर चुकाएगी? यदि भविष्य में कोई जनहानि होती है, तो क्या प्रशासन इसकी जिम्मेदारी अपने सिर लेगा?

6. जनप्रतिनिधियों का अल्टीमेटम: अब लीपापोती नहीं, होगी आर-पार की लड़ाई

इस गंभीर धोखे के खिलाफ मेघनाथ वार्ड की पार्षद श्रीमती रामरति इवनाती और संत रविदास वार्ड के पूर्व पार्षद एवं वर्तमान शिवाजी वार्ड पार्षद/सभापति श्री मदन भागे ने कड़ा मोर्चा खोल दिया है। दोनों जनप्रतिनिधियों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि जनहितैषी कार्यों में यह कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि नगर पालिका प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से निर्माण एजेंसी (ठेकेदार) और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, तो जनता को साथ लेकर उग्र आंदोलन किया जाएगा। जनता अब और छले जाने के मूड में नहीं है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer):

यह समाचार रिपोर्ट पूर्णतः मौके पर मौजूद धराशायी रिटर्निंग वॉल की प्रत्यक्ष भौतिक स्थिति, स्थानीय वार्डवासियों के बयानों, और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों (पार्षदों) द्वारा नगर पालिका प्रशासन के समक्ष आधिकारिक रूप से उठाई गई आपत्तियों व शिकायतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी संस्था या व्यक्ति विशेष को अकारण मानहानि पहुंचाना नहीं है, बल्कि ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम’ और ‘सार्वजनिक निर्माण नियमों’ के तहत जनता के धन की सुरक्षा एवं आम नागरिकों के जीवन पर मंडरा रहे खतरे के प्रति संबंधित प्रशासनिक और जांच एजेंसियों (EOW/Lokayukta) को उनके वैधानिक दायित्वों का बोध कराना है। निर्माण कार्य की तकनीकी विफलताओं का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में है।

और पढ़ें

और पढ़ें