‘इधर से उधर वाले चाचा’ और ‘विकास-विरोधी’ – इन्हें ‘गड्ढे’ प्यारे, ‘विकास’ से बैर!

यह कहानी है हमारे प्यारे पांढुर्ना की, जहाँ वर्षों की उदासीनता के बाद विकास की एक छोटी सी किरण क्या आई, राजनीति के पुराने कीचड़ में खलबली मच गई।
1. नायक नहीं, ‘विनायक’ (विरोधी पात्रों) का उदय:
शहर में दो प्रकार के ‘विशेष जनप्रतिनिधि’ अचानक चर्चा में आ गए हैं:
- ‘विकास-विरोधी’: ये वे महानुभाव हैं जो अपने मोहल्ले का चुनाव भी नहीं जीत पाए, पर अब पूरे शहर के ‘विकास की कुंडली’ अपने हाथ में लेकर बैठे हैं।
- ‘इधर से उधर वाले चाचा’ (पार्टी-बदल विशेषज्ञ): ये अनुभवी नेता हैं, जिनका राजनीति में सबसे बड़ा ‘विकास’ यही है कि हर चुनाव में ये एक नई पार्टी में कूदकर अपनी सीट बचाते हैं। विकास के नाम पर इनका योगदान पिछले 20 सालों से ‘शून्य’ है।
2. ‘वरुड रोड का दुःख’ (असली परेशानी पर मौन):
हमारा वरुड रोड सालों से दुःख की निशानी था। रोड में गड्ढे कम, गड्ढों में रोड ज्यादा बचा था। लोग रोज़ अपनी कमर टूटने का खतरा उठाते थे। इसी तरह, रेलवे फाटक पर ओवरब्रिज न होने से रोज़ हज़ारों लोग नरक भोगते हैं।
तीखा प्रश्न: जब ये वास्तविक, ज्वलंत समस्याएँ थीं, तब क्या हमारे ‘विकास-विरोधी’ या ‘इधर से उधर वाले चाचा’ ने कभी आवाज़ उठाई? नहीं! क्योंकि वह तो जनता की ‘छोटी-मोटी’ समस्या थी, जिसमें इन्हें कोई राजनीतिक ‘फ़ायदा’ नज़र नहीं आया।
3. विरोध का कारण: ‘स्वार्थ’ बनाम ‘सामूहिक लाभ’ का तर्क

अब, जब खबर आई कि यही वरुड रोड कलेक्टर कार्यालय के लिए सबसे उपयुक्त जगह बनने वाली है, तो इन दोनों महानुभावों ने ‘विरोध का ढोंग’ शुरू कर दिया।
- विकास-विरोधी का आरोप: “यह तो सरासर अन्याय है! कलेक्टर कार्यालय को वहाँ ले जाना किसी बड़े आदमी की ज़मीन का भाव बढ़ाने की साज़िश है!”
- इधर से उधर वाले चाचा का समर्थन: “हाँ! हम पांढुर्ना को इस भ्रष्ट विकास से बचाएँगे!”
जनता ने इस नाटक पर पलटवार करते हुए, सौम्य लेकिन तीखे कटाक्ष के साथ कहा:
”माननीय महानुभावों! आपसे तो पांढुर्ना का विकास हुआ नहीं! आप तो केवल पार्टी बदलने और गड्ढों पर चुप्पी साधने में व्यस्त रहे। अब, अगर कोई व्यक्ति अपने ‘स्वार्थ’ (अपनी ज़मीन का भाव बढ़ाने) के लिए ही सही, लेकिन कलेक्टर कार्यालय को वरुड रोड पर ला रहा है, तो इसमें पांढुर्ना वासियों का क्या नुकसान है?“
“क्या सारी ज़मीनें उस एक व्यक्ति की हैं? नहीं! उस क्षेत्र में रहने वाले सैकड़ों आम लोगों की भी तो ज़मीनें हैं! उनका भला नहीं होगा? अगर किसी के ‘स्वार्थ’ से हमारे शहर का सामूहिक विकास होता है, तो आप इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?”
जनता की इस सीधी और तार्किक बात के सामने, ‘विकास-विरोधी’ और ‘इधर से उधर वाले चाचा’ दोनों के पास कोई जवाब नहीं था। उनके खोखले विरोध के नारे हवा में ही सिमट कर रह गए।

