विशेष रिपोर्ट: लीज के नियम क्या कहते हैं, और क्या खसरा 152 के छोटे से हिस्से पर नियमों का पालन हुआ है?
पांढुर्णा। शहर के बीचों-बीच चल रहे एक बहुमंजिला कॉम्प्लेक्स के निर्माण ने एक बड़ा प्रशासनिक पेंच पैदा कर दिया है। यह निर्माण जिस जमीन पर हो रहा है, वह असल में खसरा क्रमांक 152 नामक एक बहुत बड़े सरकारी भूखंड का केवल एक छोटा हिस्सा है। यह भूखंड लगभग 25 एकड़ का है और इस पर सरकारी दफ्तर भी बने हुए हैं।
इस पूरी बात को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सरकारी जमीन ‘लीज’ पर क्यों और कैसे दी जाती है?

1. लीज (पट्टा) का आसान मतलब
सरकारी जमीन पर ‘लीज’ देना ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी का मकान लंबे समय के लिए किराए पर लें, लेकिन उसे खरीद न सकें।
सरकार जमीन की मालिक बनी रहती है। वह आपको जमीन सिर्फ एक निश्चित समय (जैसे 30 या 99 साल) के लिए इस्तेमाल करने का अधिकार देती है। यह अधिकार एक लिखित अनुबंध (पट्टा) में मिलता है। इस अनुबंध में लिखा होता है कि आप जमीन पर क्या बना सकते हैं—जैसे अगर आपको रहने के लिए जमीन मिली है, तो आप उस पर दुकान या कॉम्प्लेक्स नहीं बना सकते।
2. खसरा 152 और बैंक से खरीद का पेंच
खसरा 152 का मामला इसलिए उलझा हुआ है क्योंकि यह जमीन बहुत बड़ी है, और जिस हिस्से पर कॉम्प्लेक्स बन रहा है, वह पुराने समय में एक निजी व्यापारी के पास पट्टे पर थी। जब व्यापारी दिवालिया हो गया तो बैंक ने उस हिस्से को नीलाम कर दिया।
यह प्रशासनिक उलझन का सबसे बड़ा बिंदु है: बैंक ने केवल उस जमीन पर बना पुराना ढांचा बेचा, या पुराना इस्तेमाल करने का अधिकार? कानूनी नियम यह कहते हैं कि पट्टे की जमीन को बेचने या ट्रांसफर करने से पहले सरकार से लिखित अनुमति लेना जरूरी होता है। अगर नए खरीदार (बिल्डर) ने यह अनुमति नहीं ली, तो उनका कब्जा कानूनी तौर पर वैध नहीं माना जा सकता। प्रशासन को इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि क्या यह अनुमति ली गई थी।
3. सिस्टम को इन तीन सवालों पर रोशनी डालनी होगी

अगर यह निर्माण नियमों के अनुसार चल रहा है, तो प्रशासनिक रिकॉर्ड में तीन जवाब साफ-साफ होने चाहिए। प्रशासन को आम जनता के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए ताकि लोगों का भ्रम दूर हो सके:
- पहला सवाल (इस्तेमाल): क्या पुराने घर की जमीन को कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति मिल गई है? यानी, क्या ‘घर’ की जमीन का उपयोग ‘दुकान’ के लिए बदलने की सरकारी फीस जमा की गई है?
- दूसरा सवाल (अनुमति): चूंकि जमीन सरकारी है, क्या नगर पालिका ने नक्शा पास करने से पहले राजस्व विभाग से स्पष्ट अनुमति पत्र (NOC) माँगा था? बिना इस पत्र के निर्माण की अनुमति देना नियमों का उल्लंघन होगा।
- तीसरा सवाल (रिकॉर्ड): क्या पुराने पट्टेदार से नए खरीदार के नाम पर इस्तेमाल का अधिकार (लीज) सरकारी कागजात में सही तरीके से बदल दिया गया है?
4. खसरा 152 में सैकड़ों दुकानें: अरबों का चूना किसे? (नया और सबसे बड़ा सवाल)

यह समस्या सिर्फ नए बन रहे कॉम्प्लेक्स तक सीमित नहीं है। खसरा 152 में पहले से ही सैकड़ों दुकानें और घर बने हुए हैं, और इनमें से कई स्थानों पर व्यापारिक गतिविधियाँ भी चल रही हैं।
सवाल यह है: यदि लीज के नियम इतने स्पष्ट हैं कि आवासीय जमीन पर व्यापार नहीं किया जा सकता, तो क्या इन सैकड़ों दुकानों और कॉम्प्लेक्स में भी नियमों का पालन हो रहा है?
यदि इन सभी स्थानों पर आवासीय पट्टों का उपयोग व्यापार के लिए हो रहा है, तो सरकार को व्यावसायिक प्रीमियम (डायवर्शन फीस) के रूप में मिलने वाला अरबों रुपये का राजस्व सीधे तौर पर चूना लगाया जा रहा है। यह मामला अब एक छोटी-सी इमारत से बढ़कर संपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्र में लीज नियमों के पालन का बन गया है।
अंत तक बना संदेह: पारदर्शिता कब आएगी?
पांढुर्णा के नागरिकों को यह जानकर आश्चर्य होता है कि जब इस जमीन के मालिक स्पष्ट रूप से ‘मध्यप्रदेश शासन’ हैं, तो निर्माण कार्य पूरी रफ्तार से चल रहा है।
सवाल किसी अधिकारी पर नहीं है, सवाल केवल सिस्टम की पारदर्शिता पर है। जनता को सिर्फ इतना जानना है कि क्या इस बड़ी सरकारी जमीन पर बन रहे कॉम्प्लेक्स के लिए सारे सरकारी नियम और कानून पूरी तरह से पूरे किए गए हैं? या फिर, क्या इतनी बड़ी सरकारी जमीन पर चल रहे काम में कहीं कोई ‘अधूरा कागज’ तो नहीं छूट गया है, जिसका खुलासा होना बाकी है?


