नगर पालिका कार्यालय से मात्र 50 मीटर की दूरी पर देर रात तक चली अवैध बोरिंग; क्या प्रशासनिक क्षेत्र में ‘कानून का डर’ खत्म हो गया है?
पांढुर्णा, : शहर के उस अति संवेदनशील क्षेत्र में बीती रात एक ऐसी घटना हुई, जिसने न केवल नागरिकों की नींद हराम कर दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि नियम तोड़ने वाले, प्रशासनिक अधिकारियों की आँखों के सामने भी कितने निर्भीक हो सकते हैं।
मामला नजूल की विवादित जमीन पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच बोरिंग मशीन चलने का है, जबकि यह समय ध्वनि प्रदूषण नियमों के तहत पूर्णतः प्रतिबंधित है।
1. आस्था के केंद्र के पीछे कानून की अनदेखी

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह पूरा अवैध कृत्य पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमरावजी आम्बेडकर की प्रतिमा के ठीक पीछे वाले परिसर में हुआ। यह वह परिसर है जो पहले ही अपनी पारदर्शिता और नजूल शर्तों के कारण चर्चा में रहा है। एक ऐसे आस्था और न्याय के प्रतीक स्थल के पास कानून को रौंदना, प्रशासन पर गहरा नैतिक प्रश्नचिह्न लगाता है।
उदाहरण 1: चौकीदार का सो जाना
मान लीजिए एक बहुमूल्य खजाना बैंक के वॉल्ट में है। वॉल्ट के बाहर रात भर चोरी होती रहती है, और पुलिस चौकी में कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं होता। यहाँ चौकीदार को तनख्वाह कानून लागू करने के लिए मिलती है। इस घटना में, कानून के चौकीदार इस शोर को नहीं सुन पाए, जबकि आवाज़ सबसे शांत क्षेत्र में हो रही थी।
2. प्रशासनिक विफलता का जीवित प्रमाण: 50 मीटर की दूरी

कानून के उल्लंघन की यह घटना इसलिए अधिक गंभीर है, क्योंकि यह नगर पालिका कार्यालय से मात्र 50 मीटर की दूरी पर हुई है।
- नगर पालिका कार्यालय के पास ही शहर के कई उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय स्थित हैं।
- उच्च अधिकारियों के आवास भी इसी परिसर के आसपास हैं।
कानूनी प्रश्न: अनुमति देने की शक्ति किसके पास है?
यह एक न्यायिक सत्य है कि कोई भी अधिकारी, (चाहे वह आदरणीय कलेक्टर महोदय ही क्यों न हों), किसी भी निजी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक शोर करने की लिखित या मौखिक अनुमति नहीं दे सकते। ऐसा आदेश कानून की नजर में अमान्य होता है।
सवाल उठता है: जब दिन के समय हेलमेट न पहनने पर तुरंत कार्रवाई होती है, तो प्रशासनिक कार्यालयों से मात्र 50 मीटर दूर और बाबा साहेब की प्रतिमा के पीछे सरेआम हो रहे इतने बड़े कानून के उल्लंघन पर तुरंत कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
4. अब अंतिम सवाल: हेलमेट पर सख्ती, कानून पर चुप्पी क्यों?
अगर शहर में कोई नागरिक बिना हेलमेट के जाता है, तो यातायात पुलिस तुरंत रोककर जुर्माना लगाती है, ताकि दुर्घटना न हो। यह एक त्वरित कार्रवाई है, जिसे कानूनी व्यवस्था कहा जाता है।
परंतु…
जिस क्षेत्र में नगर पालिका का मुख्यालय स्थित है, वहाँ रात भर ध्वनि प्रदूषण और नजूल शर्तों का उल्लंघन हुआ, जिससे सैकड़ों लोगों की नींद खराब हुई और संवैधानिक अधिकारों का हनन हुआ—पर कोई कार्रवाई नहीं हुई!
क्या इसका अर्थ यह है कि पांढुर्णा में छोटे नियम तोड़ने पर तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन कानून का गला घोंटने पर प्रशासन की आँखों पर पट्टी बंध जाती है?
देखिए क्या चालाकी किया गया है काम

यह घटना शुक्रवार रात की है। नियम तोड़ने वाला व्यक्ति संभवतः यह गणित लगाकर निश्चिंत बैठा होगा:
- शुक्रवार रात: काम खत्म कर लो।
- शनिवार और रविवार: कार्यालय बंद रहेंगे, कोई शिकायत दर्ज नहीं होगी।
- सोमवार: मामला ठंडा पड़ चुका होगा।
परंतु, नियम तोड़ने वाले को विनम्र निवेदन है कि उनकी यह सोच गलत है।
कानूनी सच्चाई यह है: अपराध ‘छुट्टी’ को देखकर नहीं होता, और वह समाप्त भी नहीं होता। कानून की प्रक्रिया 24×7 चालू रहती है। आज नागरिक पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं।
प्रशासनिक प्रमुखों को सूचित किया जाता है कि नागरिक समूह केवल सोमवार का इंतजार नहीं करेंगे। इस सोमवार से अगले सोमवार तक, यह मामला सार्वजनिक रहेगा और कानूनी प्रक्रियाएं जारी रहेंगी। नियम तोड़ने वाले को समझ लेना चाहिए कि उनकी यह “चालाकी” अब स्थायी कानूनी कार्रवाई का कारण बनेगी, जिसे कोई छुट्टी या कार्यालय की बंदिशें रोक नहीं पाएंगी।


