
पांढुर्ना |पांढुर्णा शहर के बीचों-बीच चल रहे खसरा क्रमांक 152 के विवादित निर्माण पर कानूनी और प्रशासनिक पेंच लगातार गहराता जा रहा है। यह विवाद सरकारी लीज (पट्टे) की शर्तों और भूखंड के उपयोग परिवर्तन (आवासीय से व्यावसायिक) की वैध अनुमति से जुड़ा है।
हम इस पूरे मामले की तह तक जाएंगे और जल्द ही इस विवादास्पद परिसर के निर्माण की वैधानिकता पर विस्तृत खुलासा करेंगे।
मुख्य फोकस: खसरा 152 का विवादित निर्माण ?
खसरा 152 नामक विशाल सरकारी भूखंड के एक छोटे से हिस्से पर बन रहे इस कॉम्प्लेक्स को लेकर प्रशासनिक रिकॉर्ड में तीन मुख्य बिंदुओं पर पारदर्शिता की कमी है:
- 1. लीज ट्रांसफर की अनुमति: क्या बैंक नीलामी के बाद नए खरीदार (बिल्डर) को सरकारी जमीन के इस्तेमाल का अधिकार ट्रांसफर करने से पहले राजस्व विभाग से लिखित अनुमति ली गई थी, जैसा कि लीज के नियम बताते हैं?
- 2. उपयोग परिवर्तन (डायवर्शन): यदि जमीन पहले घर (आवासीय) के लिए लीज पर थी, तो उसे दुकान/कॉम्प्लेक्स (व्यावसायिक) बनाने के लिए बदलने की सरकारी फीस (प्रीमियम) जमा की गई है या नहीं?
- 3. राजस्व का चूना: खसरा 152 में पहले से बनी सैकड़ों दुकानें जो कथित तौर पर आवासीय लीज पर चल रही हैं, क्या वे सभी व्यावसायिक प्रीमियम चुका रही हैं? यदि नहीं, तो सरकार को अरबों रुपये के राजस्व का सीधे तौर पर चूना लगाया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल:3 लोगो की संपत्ति और ‘खेल’?

खसरा 152 जैसी बेशकीमती सरकारी जमीन के कथित मनमाने लेन-देन के बीच एक बड़ा और गहरा सवाल खड़ा होता है:
कौन हैं वो तीन लोग, जिनके पास 10-15 साल पहले अपनी गाड़ी में पेट्रोल डलवाने के भी पैसे नहीं होते थे, पर आज उनकी संपत्ति करोड़ों रुपये में हो गई है?
क्या इन्हीं लोगो ने मिलकर यह पूरा ‘खेल’ रचा है? और पांढुर्णा में सरकारी नियमों को ताक पर रखकर इन्होंने और कहाँ-कहाँ भ्रष्टाचार किया है?
इस पूरे मामले में प्रशासनिक रिकॉर्ड की जाँच और लोगो की आय से अधिक संपत्ति का खुलासा जल्द ही संभावित है। हमारे अगले एपिसोड का इंतज़ार करें।

