May 13, 2026 11:26 am

जानिए सच कैसे हुआ यह फर्जी डिग्री का खेल: 10वीं पास डॉ. आर. एन. बिस्वास की ‘इंडो एलोपैथी’ और ‘IBAM कोलकाता’ की डिग्रियों का महा-खुलासा!

 अंग्रेजी के भारी-भरकम अक्षरों के पीछे छिपे ‘फर्जीवाड़े’ की अद्भुत कहानी

हमारे समाज में अक्सर कहा जाता है कि डॉक्टर बनने के लिए इंसान को अपनी जवानी के कई साल विज्ञान की कठिन पढ़ाई में तपाने पड़ते हैं। लेकिन पांढुर्णा के ग्राम सिवनी में संचालित ‘गीता क्लीनिक’ के संचालक डॉ. आर. एन. बिस्वास की ‘प्रतिभा’ इस पुरानी मान्यता को पूरी तरह झुठला देती है! ‘पांढुर्णा वॉच’ की लगातार और निडर मुहिम के बाद जब प्रशासन जागा और दस्तावेजों की परतें खुलीं, तो जो ‘सच’ सामने आया, वह किसी भी पढ़े-लिखे इंसान को हैरत में डाल देगा।

​क्या आप सोच सकते हैं कि बोर्ड पर भारी-भरकम अंग्रेजी अक्षरों (डिग्रियों) का जाल बुनकर, एक 10वीं पास व्यक्ति इतने सालों तक सरेआम ‘जनरल इलाज’ कर सकता है? यह खबर किसी व्यक्ति के विरोध में नहीं है, बल्कि सिवनी और पांढुर्णा की जनता की आंखें खोलने के लिए है। आइए, अत्यंत सरल और सौम्य भाषा में 6 विस्तृत वैधानिक बिंदुओं के माध्यम से ‘डिकोड’ करते हैं कि आखिर यह ‘फर्जी डिग्रियों का खेल’ कैसे खेला जाता है और कैसे भोली-भाली जनता इसके जाल में फंस जाती है:

1. 10वीं पास (थर्ड डिवीजन) से सीधे ‘मसीहा’ बनने का अद्भुत चमत्कार!

चिकित्सा विज्ञान का सबसे पहला नियम है कि इसके लिए 12वीं कक्षा में विज्ञान (Biology) का होना अनिवार्य है। लेकिन डॉ. बिस्वास के जो शैक्षणिक दस्तावेज जांच के दायरे में आए हैं, वे उनकी ‘अद्भुत शैक्षिक क्षमता’ को दर्शाते हैं। दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1980 में पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से मात्र 10वीं कक्षा पास की है, वह भी ‘थर्ड डिवीजन’ में! 10वीं के बाद सीधे मेडिकल प्रैक्टिस के मैदान में उतर जाना, अपने आप में एक ऐसा ‘चमत्कार’ है, जिस पर शायद नोबेल पुरस्कार समिति को भी विचार करना चाहिए। क्या बिना बुनियादी विज्ञान पढ़े, मानव शरीर के साथ प्रयोग करना जनता की जान के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है?

2. ‘IBAM कोलकाता’ का जादुई सर्टिफिकेट: जो UGC की ‘फर्जी’ सूची में शान से दर्ज है!

गीता क्लीनिक के बोर्ड पर I.B.A.M. (इंडियन बोर्ड ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन्स, कोलकाता) की डिग्री बड़े ही रौब से लिखी गई है। अंग्रेजी के इन चार अक्षरों को देखकर ग्रामीण मरीज इन्हें बहुत बड़ा डॉक्टर मान बैठते हैं। लेकिन सच्चाई क्या है? भारत सरकार के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने आधिकारिक तौर पर इस ‘IBAM’ संस्था को ‘फर्जी’ (Fake) विश्वविद्यालयों की सूची में डाला हुआ है । जब संस्था ही फर्जी है और उसे भारत में कोई भी डिग्री बांटने का कानूनी अधिकार ही नहीं है, तो उस संस्था के छपे हुए कागज के टुकड़े को ‘मेडिकल डिग्री’ मान लेना, क्या कानून की आंखों में धूल झोंकना नहीं है?

3. ‘इंडो एलोपैथी’ का भारी-भरकम नाम: कानून की किताबों से ‘गायब’ चिकित्सा पद्धति!

फर्जी डिग्रियों के इस खेल में सबसे बड़ा धोखा ‘शब्दों’ का होता है। डॉक्टर साहब के एक प्रमाणपत्र में उन्हें ‘इंडो एलोपैथी’ (Indo Allopathy) का R.M.P. बताया गया है। क्या आप जानते हैं कि भारत के ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) या आयुष मंत्रालय की किसी भी सूची में “इंडो एलोपैथी” नाम की कोई मान्य चिकित्सा पद्धति मौजूद ही नहीं है! यह केवल ‘एलोपैथी’ (अंग्रेजी दवाइयों) शब्द का चालाकी से इस्तेमाल करके गढ़ा गया एक ऐसा भ्रामक नाम है, ताकि प्रशासन और जनता को लगे कि यह कोई असली मेडिकल डिग्री है। क्या ऐसे मनगढ़ंत शब्दों के आधार पर इलाज करना ‘धोखाधड़ी’ की श्रेणी में नहीं आता?

4. माननीय सर्वोच्च न्यायालय की परिभाषा: आखिर ‘झोलाछाप’ कौन है?

अक्सर ऐसे तथाकथित डॉक्टर दावा करते हैं कि वे तो सिर्फ समाज सेवा कर रहे हैं। लेकिन कानून किसी को भी ‘अवैध समाज सेवा’ की अनुमति नहीं देता। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1996 के ऐतिहासिक ‘पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल’ मामले में स्पष्ट कर दिया है कि— “वह व्यक्ति जिसके पास किसी विशेष चिकित्सा पद्धति का ज्ञान नहीं है, लेकिन फिर भी वह उस पद्धति में प्रैक्टिस करता है, तो वह कानूनी रूप से ‘क्वाक’ (झोलाछाप) और ढोंगी है” । क्या 10वीं पास होने के बाद अमान्य डिग्रियों के सहारे एलोपैथिक प्रैक्टिस करना सर्वोच्च न्यायालय की इस परिभाषा पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता?

5. ‘पांढुर्णा वॉच’ की मुहिम का असर: जनता के लिए एक विनम्र सीख!

आज ‘पांढुर्णा वॉच’ की खोजी पत्रकारिता ने यह साबित कर दिया है कि सच्चाई को ज्यादा दिन तक किसी ‘बोर्ड’ के पीछे नहीं छुपाया जा सकता। हम सिवनी और पांढुर्णा की जनता को जागरूक करना चाहते हैं कि कभी भी क्लीनिक के बाहर लिखे लंबे-चौड़े अंग्रेजी अक्षरों से प्रभावित न हों। हमेशा सुनिश्चित करें कि आपके डॉक्टर के पास मान्यता प्राप्त ‘MBBS’ या समकक्ष सरकारी डिग्री हो। जो डिग्रियां यूजीसी (UGC) और मेडिकल काउंसिल की नजर में ‘कचरा’ हैं, उनके आधार पर अपने शरीर को खतरे में डालना समझदारी नहीं है।

6. क्या अब प्रशासन ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ (NMC) एक्ट के तहत करेगा वैधानिक कार्रवाई?

हम पांढुर्णा के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की तारीफ करते हैं कि उन्होंने मामले का संज्ञान लिया और जांच प्रक्रिया शुरू की। लेकिन अब जब इन डिग्रियों की ‘फर्जी हकीकत’ सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों से पूरी तरह साफ हो चुकी है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ‘नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट 2019’ की धारा 34 साफ कहती है कि बिना वैध पंजीकरण के चिकित्सा करना 5 लाख रुपये जुर्माने और 1 साल की जेल वाला अपराध है । क्या प्रशासन अब इस ‘डिग्री के खेल’ पर पूर्ण विराम लगाते हुए सुसंगत धाराओं के तहत कठोर वैधानिक कार्रवाई करेगा, या फिर किसी रसूखदार के दबाव में यह फाइल भी ठंडे बस्ते में चली जाएगी? यह देखना दिलचस्प होगा!

जनहित में वैधानिक उद्घोषणा (Statutory Disclaimer):

यह समाचार पूर्णतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की आधिकारिक फर्जी विश्वविद्यालय सूची, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित वैधानिक निर्णयों, NMC Act के प्रावधानों और ‘पांढुर्णा वॉच’ की खोजी पत्रकारिता में प्राप्त दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित है। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था की मानहानि करना नहीं है, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के मूल अधिकार की रक्षा हेतु आम जनता को फर्जी डिग्रियों के प्रति जागरूक करना और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। खबर में लगाए गए सभी आरोप प्रश्नवाचक (?) शैली में जनहित के सवाल मात्र हैं, जिनकी सत्यता की पुष्टि और वैधानिक कार्रवाई करना सक्षम अधिकारियों का कर्तव्य है।

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